प्राइमरी में ड्रॉपआउट शून्य, माध्यमिक शिक्षा में चुनौती

उत्तर प्रदेश में शिक्षा के क्षेत्र में प्राथमिक स्तर पर सकारात्मक बदलाव देखने को मिला है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, प्राथमिक कक्षाओं में ड्रॉपआउट दर लगभग शून्य के स्तर तक पहुंच गई है, जो शिक्षा विभाग के लिए बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है। विभिन्न योजनाओं, नामांकन अभियान और विद्यालयों में बुनियादी सुविधाओं के विस्तार का इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ा है।
हालांकि माध्यमिक शिक्षा में स्थिति अब भी चिंताजनक बनी हुई है। बड़ी संख्या में विद्यार्थी आठवीं के बाद पढ़ाई छोड़ रहे हैं, जिसके पीछे आर्थिक कारण, सामाजिक परिस्थितियां, लंबी दूरी, पारिवारिक जिम्मेदारियां और संसाधनों की कमी जैसी कई चुनौतियां जिम्मेदार मानी जाती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि माध्यमिक स्तर पर विद्यार्थियों को स्कूल से जोड़कर रखना शिक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में शामिल होना चाहिए।
वहीं छात्र-शिक्षक अनुपात (PTR) के मामले में भी उत्तर प्रदेश को अभी लंबा सफर तय करना है। कई सरकारी विद्यालयों में शिक्षकों के रिक्त पद और बढ़ती छात्र संख्या के कारण एक शिक्षक पर अधिक विद्यार्थियों की जिम्मेदारी है। इससे पढ़ाई की गुणवत्ता प्रभावित होने की आशंका रहती है। शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि बेहतर शिक्षण व्यवस्था के लिए नए शिक्षकों की नियुक्ति, विद्यालयों में संसाधनों का विस्तार और माध्यमिक शिक्षा पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है, ताकि प्राथमिक स्तर पर मिली सफलता को आगे की कक्षाओं तक भी कायम रखा जा सके।



