बांग्लादेश में तख्तापलट को अब एक साल हो चुका है। 2024 में हुए इस राजनीतिक उलटफेर ने न केवल देश की सत्ता संरचना को बदल दिया, बल्कि सामाजिक और युवाओं की चेतना में भी एक बड़ा बदलाव ला दिया। सेना के हस्तक्षेप से चुनी हुई सरकार को हटाए जाने और नई सैन्य-समर्थित अंतरिम व्यवस्था के आने के बाद कई सवाल उठे—क्या बांग्लादेश में स्थायित्व आया? और उन हज़ारों छात्रों का क्या हुआ जो इस आंदोलन में सबसे आगे थे?
तख्तापलट के समय देशभर में छात्र संगठन, विश्वविद्यालयों के छात्र और राजनीतिक कार्यकर्ता सड़कों पर उतरे थे। वे लोकतंत्र की बहाली, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और बेरोजगारी के खिलाफ आवाज़ उठा रहे थे। खासकर ढाका विश्वविद्यालय और राजशाही विश्वविद्यालय आंदोलन के केंद्र बने थे। लेकिन अब, एक साल बाद, वही छात्र या तो जेलों में बंद हैं, भूमिगत जीवन जी रहे हैं या नौकरी और शिक्षा से वंचित हो चुके हैं।
अंतरिम सरकार ने शुरुआत में वादा किया था कि वह जल्द चुनाव कराएगी और सत्ता जनता के प्रतिनिधियों को सौंपेगी। लेकिन एक साल बाद भी कोई ठोस चुनावी प्रक्रिया शुरू नहीं हुई है। इसके बजाय, सरकार ने कड़े सुरक्षा कानून, मीडिया पर सेंसरशिप, और विरोधियों की गिरफ्तारी जैसे कदम उठाए हैं। मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्ट बताती है कि तख्तापलट के बाद से अब तक सैकड़ों छात्रों और कार्यकर्ताओं को बिना मुकदमे के हिरासत में रखा गया है।
आंदोलन में शामिल एक पूर्व छात्र नेता का कहना है, “हमने लोकतंत्र के लिए आवाज़ उठाई थी, लेकिन अब हमें ‘देशद्रोही’ कहा जाता है। मेरे कई साथी या तो गायब हैं या परिवार से दूर छिपकर जी रहे हैं।” यह बयान बांग्लादेश में मौजूदा स्थिति की भयावह तस्वीर पेश करता है।
आर्थिक मोर्चे पर देखें तो बांग्लादेश की GDP में मामूली गिरावट, विदेशी निवेश में कमी और बेरोजगारी दर में वृद्धि देखने को मिली है। अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने बांग्लादेश की स्थिति को “राजनीतिक अस्थिरता से प्रभावित” करार दिया है।
हालांकि, सरकार समर्थक गुटों का दावा है कि “व्यवस्था में सुधार लाने और भ्रष्टाचार पर लगाम कसने के लिए यह बदलाव जरूरी था।” लेकिन आलोचक इसे लोकतंत्र की हत्या और युवाओं की आवाज़ को कुचलने की प्रक्रिया बता रहे हैं।
एक साल के भीतर बांग्लादेश में जो बदलाव आया है, वह आंतरिक स्थिरता से अधिक दमन और भय का वातावरण बनकर सामने आया है। आंदोलनकारी छात्र, जो देश का भविष्य माने जाते थे, आज या तो खामोश हैं या अपने जीवन को फिर से पटरी पर लाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
अब बांग्लादेश के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या सैन्य शासन के तहत स्थिरता की कीमत लोकतंत्र और युवा आवाज़ों की कुर्बानी होगी? आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि देश किस दिशा में आगे बढ़ेगा।



