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Iran-US Deal: 85% भरोसे के बावजूद क्यों अटका है समझौता? ईरान की शर्तों ने बढ़ाई चिंता

ईरान और अमेरिका के बीच संभावित शांति समझौते को लेकर कूटनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। अमेरिकी प्रशासन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने दावा किया है कि समझौते के अगले कुछ दिनों में होने की संभावना 80 से 85 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है। हालांकि उन्होंने यह भी माना कि स्थिति अभी “100 प्रतिशत तय” नहीं है।

रिपोर्टों के अनुसार दोनों पक्ष एक प्रारंभिक मसौदे पर काफी हद तक आगे बढ़ चुके हैं, लेकिन परमाणु कार्यक्रम, समृद्ध यूरेनियम के भंडार, प्रतिबंधों में राहत और होरमुज जलडमरूमध्य की स्थिति जैसे मुद्दों पर मतभेद अभी भी पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं।

अमेरिका का कहना है कि किसी भी समझौते में ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर कड़े नियंत्रण और सत्यापन योग्य प्रतिबद्धताएं शामिल होनी चाहिए। वहीं ईरान आर्थिक प्रतिबंधों में राहत, जमे हुए वित्तीय संसाधनों तक पहुंच और अपनी संप्रभुता से जुड़े मुद्दों पर स्पष्ट आश्वासन चाहता है।

समझौते को लेकर एक और बड़ी चुनौती ईरान के भीतर मौजूद विभिन्न राजनीतिक धड़ों की राय है। अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि वॉशिंगटन में सहमति का स्तर अपेक्षाकृत अधिक है, लेकिन तेहरान में कुछ वर्ग अब भी प्रस्तावित शर्तों को लेकर सवाल उठा रहे हैं।

विश्लेषकों का कहना है कि यदि समझौता होता भी है तो शुरुआती चरण में यह पूर्ण समाधान के बजाय युद्धविराम और आगे की बातचीत का आधार बन सकता है। कई संवेदनशील मुद्दों पर विस्तृत वार्ता बाद में जारी रहने की संभावना जताई जा रही है।

फिलहाल दोनों देशों के बीच सकारात्मक संकेत जरूर दिखाई दे रहे हैं, लेकिन अंतिम समझौते तक पहुंचने के लिए कई जटिल राजनीतिक और रणनीतिक बाधाओं को पार करना बाकी है। यही वजह है कि उम्मीदों के बावजूद अनिश्चितता अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।

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