
“भारत पर ट्रंप क्यों बरस रहे हैं?” यह सवाल इन दिनों अंतरराष्ट्रीय व्यापार और राजनीति के गलियारों में तेजी से गूंज रहा है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में भारत द्वारा कुछ अमेरिकी उत्पादों पर टैरिफ (शुल्क) बढ़ाने के जवाब में तीखी प्रतिक्रिया दी और कहा,
“अभी तो टैरिफ लगे सिर्फ 8 घंटे हुए हैं, आगे और भी बहुत कुछ देखना बाकी है।”
लेकिन सवाल यह है कि भारत का यह कदम ट्रंप को इतना चुभ क्यों गया?
एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह सिर्फ व्यापार का मामला नहीं है, बल्कि ट्रंप के ‘ईगो’ से जुड़ा है।
दरअसल, मामला तब शुरू हुआ जब भारत सरकार ने अमेरिका से मिलने वाली जीएसपी (Generalized System of Preferences) सुविधा को लेकर अमेरिका के एकतरफा रवैए के खिलाफ कदम उठाया। जीएसपी एक व्यापारिक छूट योजना है जिसके तहत भारत जैसे विकासशील देशों को अमेरिका में कई वस्तुएं शुल्क मुक्त भेजने की अनुमति थी। लेकिन ट्रंप प्रशासन ने इसे 2019 में भारत के लिए समाप्त कर दिया।
भारत सरकार ने इस फैसले को लेकर कई स्तरों पर विरोध जताया और वार्ता भी की, लेकिन ट्रंप का रुख बेहद आक्रामक बना रहा। इसके बाद भारत ने भी अपने हितों की रक्षा करते हुए कुछ अमेरिकी वस्तुओं पर प्रतिशोधात्मक टैरिफ लगा दिए — जिनमें सेब, बादाम, अखरोट और कुछ मशीनरी उत्पाद शामिल थे।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत का यह कदम ट्रंप को राजनीतिक और व्यक्तिगत तौर पर चुनौतीपूर्ण लगा। ट्रंप हमेशा से ही व्यापार घाटे को लेकर सख्त रुख अपनाते रहे हैं और उन्हें यह स्वीकार नहीं होता कि कोई देश उनके फैसलों के खिलाफ जाकर जवाबी कार्रवाई करे। एक पूर्व अमेरिकी कूटनीतिज्ञ के अनुसार,
“भारत की तरफ से पलटवार ट्रंप के आत्म-मूल्यांकन और ताकत के प्रति उनकी धारणा को ठेस पहुंचाता है।”
ट्रंप अब जब 2024 के राष्ट्रपति चुनाव में फिर से सक्रिय हैं, तो वह ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति को दोबारा केंद्र में ला रहे हैं। ऐसे में भारत द्वारा लिया गया कड़ा रुख उनकी छवि को नुकसान पहुंचा सकता है, खासकर ऐसे समय में जब वे खुद को अंतरराष्ट्रीय मंच पर निर्णायक नेता के तौर पर पेश करना चाहते हैं।
भारत का रवैया अब यह दिखाता है कि वह वैश्विक शक्ति संतुलन में आत्मनिर्भर और रणनीतिक रूप से स्वतंत्र भूमिका निभाने के लिए तैयार है। भारत ने साफ कर दिया है कि वह व्यापारिक बातचीत के लिए खुला है, लेकिन दबाव या धमकी की राजनीति को स्वीकार नहीं करेगा।
इस पूरे घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यह सिर्फ शुल्क का मामला नहीं है, बल्कि यह आत्मसम्मान, रणनीतिक सोच और वैश्विक नेतृत्व की लड़ाई बन चुकी है। ट्रंप की “टैरिफ मिसाइलें” अब सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेशवाहक बन गई हैं — और भारत इनका जवाब देने में अब कतई पीछे नहीं है।



