
पाकिस्तान आज भी 1971 के उन पापों से पीछा नहीं छुड़ा पा रहा है, जिनकी वजह से उसका पूर्वी हिस्सा अलग होकर बांग्लादेश के रूप में एक नए राष्ट्र के रूप में अस्तित्व में आया। 1971 का भारत-पाक युद्ध इतिहास का वह निर्णायक क्षण था जब पाकिस्तानी सेना ने पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) में बर्बरता की सारी सीमाएँ लांघ दी थीं। लाखों निर्दोष लोगों का कत्लेआम, महिलाओं के साथ अमानवीय अत्याचार और बांग्ला भाषी जनता पर अत्याचार आज भी बांग्लादेश की सामूहिक स्मृति में जख्म के रूप में दर्ज हैं। यही कारण है कि बांग्लादेश बार-बार पाकिस्तान से उन अत्याचारों के लिए औपचारिक माफी मांगता है।
बांग्लादेश का कहना है कि जब तक पाकिस्तान 1971 के अपराधों को स्वीकार नहीं करता और माफी नहीं मांगता, तब तक दोनों देशों के रिश्तों में वास्तविक सुधार संभव नहीं है। ढाका सरकार और वहां की जनता बार-बार यह मुद्दा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाती रही है। बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीबुर रहमान ने भी अपनी प्रारंभिक नीतियों में पाकिस्तान से इन अत्याचारों की स्वीकारोक्ति और माफी की मांग को महत्वपूर्ण स्थान दिया था।
इतिहास गवाह है कि 1971 में पाकिस्तान की सैन्य कार्रवाई केवल सत्ता बचाने का प्रयास नहीं थी, बल्कि एक सम्पूर्ण जातीय और सांस्कृतिक अस्मिता पर हमला था। पाकिस्तानी सेना के जनरल टिक्का खान और उनके सहयोगियों ने ‘ऑपरेशन सर्चलाइट’ चलाकर ढाका और आसपास के इलाकों में हजारों लोगों की हत्या की। अनुमान है कि उस समय लगभग 30 लाख लोग मारे गए और करीब 2 लाख महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ। यह मानवता के खिलाफ सबसे बड़े अपराधों में गिना जाता है।
भारत ने उस समय मानवता के आधार पर हस्तक्षेप किया और बांग्लादेश की स्वतंत्रता की लड़ाई में निर्णायक सहयोग दिया। 16 दिसंबर 1971 को पाकिस्तानी सेना ने आत्मसमर्पण किया और एक नया राष्ट्र बांग्लादेश बना। लेकिन आधी सदी से भी अधिक समय बीत जाने के बावजूद पाकिस्तान ने आज तक इन अत्याचारों को आधिकारिक रूप से स्वीकार नहीं किया और न ही बांग्लादेश से माफी मांगी।
आज जब बांग्लादेश तेजी से विकास की राह पर आगे बढ़ रहा है और दक्षिण एशिया में एक उभरती हुई शक्ति के रूप में अपनी पहचान बना रहा है, तब भी 1971 की त्रासदी उसकी राजनीति और कूटनीति में गहरे पैठी हुई है। यही वजह है कि हर कुछ वर्षों बाद बांग्लादेश यह मांग दोहराता है कि पाकिस्तान को सच्चाई स्वीकार करनी चाहिए।
स्पष्ट है कि जब तक पाकिस्तान ईमानदारी से अपने अतीत का सामना नहीं करेगा और 1971 के अपराधों की जिम्मेदारी नहीं लेगा, तब तक बांग्लादेश के घाव हरे रहेंगे और दोनों देशों के संबंधों में वास्तविक विश्वास बहाल नहीं हो पाएगा।



