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प्रागैतिहासिक शैलचित्रों व सांस्कृतिक विरासतों के संरक्षण हेतु IGNCA व यूपी पुरातत्व विभाग के बीच समझौता

भारत की सांस्कृतिक धरोहर विश्वभर में अपनी अनूठी परंपराओं, कला और ऐतिहासिक महत्व के कारण विशेष पहचान रखती है। प्रागैतिहासिक काल से लेकर मध्यकाल तक निर्मित हुए शैलचित्र और उनसे जुड़ी धरोहरें हमारे इतिहास की जीवंत झलक प्रस्तुत करती हैं। इन शैलचित्रों में उस समय के सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन के कई पहलुओं को देखा जा सकता है। इन्हें न केवल कला के दृष्टिकोण से बल्कि मानव सभ्यता के विकास को समझने के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी धरोहर को संरक्षित और सुरक्षित रखने के उद्देश्य से इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (IGNCA) नई दिल्ली और उत्तर प्रदेश पुरातत्व विभाग के बीच एक महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए गए हैं।

यह समझौता भारतीय सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण के क्षेत्र में एक नया अध्याय जोड़ता है। उत्तर प्रदेश के कई क्षेत्रों में प्राचीन गुफाओं और शैलाश्रयों में बने शैलचित्र पाए जाते हैं, जिनकी ऐतिहासिक और कलात्मक महत्ता अद्वितीय है। समय के साथ प्राकृतिक आपदाओं, मानवीय उपेक्षा और आधुनिक विकास कार्यों के कारण इन धरोहरों को नुकसान पहुंचा है। ऐसे में इनका संरक्षण करना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। IGNCA और यूपी पुरातत्व विभाग के बीच हुए इस समझौते का मुख्य उद्देश्य इन धरोहरों का वैज्ञानिक संरक्षण, डिजिटल डॉक्यूमेंटेशन, शोध और अध्ययन को बढ़ावा देना है।

इस पहल के अंतर्गत शैलचित्रों और सांस्कृतिक स्थलों का सर्वेक्षण, फोटोग्राफी, थ्री-डी स्कैनिंग तथा डिजिटलीकरण किया जाएगा, ताकि आने वाली पीढ़ियों तक इनका ज्ञान और महत्व सुरक्षित रूप से पहुंच सके। इसके अलावा विशेषज्ञों की टीम इन धरोहरों की संरचना, रंगों की तकनीक और उपयोग की गई विधियों का भी अध्ययन करेगी, जिससे इनकी प्रामाणिकता को बनाए रखते हुए संरक्षण किया जा सके।

समझौते का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इससे आम जनता और युवाओं में भारतीय धरोहरों के प्रति जागरूकता बढ़ेगी। कार्यशालाओं, प्रदर्शिनियों और सेमिनारों के माध्यम से इन धरोहरों का महत्व बताया जाएगा। साथ ही, पर्यटन के क्षेत्र में भी इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा, क्योंकि संरक्षित शैलचित्र और विरासत स्थल देश-विदेश के पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बनेंगे।

इस MoU के जरिए न केवल धरोहरों की रक्षा होगी बल्कि स्थानीय समुदायों को भी इससे जोड़कर उनकी भागीदारी सुनिश्चित की जाएगी। इससे रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे और क्षेत्रीय विकास को गति मिलेगी।

कुल मिलाकर, IGNCA और उत्तर प्रदेश पुरातत्व विभाग का यह संयुक्त प्रयास सांस्कृतिक धरोहरों की सुरक्षा और संरक्षण की दिशा में एक मील का पत्थर साबित होगा। यह पहल आने वाली पीढ़ियों के लिए ऐतिहासिक धरोहरों को संरक्षित रखने के साथ-साथ भारत की गौरवशाली परंपराओं को जीवंत बनाए रखने में अहम भूमिका निभाएगी।

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