
नेपाल की प्रधानमंत्री ने हाल ही में देश की मौजूदा स्थिति को लेकर एक चौंकाने वाला बयान जारी किया है। उन्होंने कहा कि नेपाल इस समय जीरो स्टेट की स्थिति में पहुंच चुका है, जहां न तो सरकारी इमारतें बची हैं और न ही कोई जरूरी दस्तावेज सुरक्षित हैं। यह गंभीर स्थिति नेपाल में चल रहे जनरेशन-ज़ी आंदोलन की हिंसक लपटों के कारण बनी है, जिसने पूरे देश को राजनीतिक और प्रशासनिक अराजकता की ओर धकेल दिया है।
प्रधानमंत्री के बयान के बाद यह साफ हो गया है कि नेपाल इस समय इतिहास के सबसे बड़े राजनीतिक संकट से गुजर रहा है। युवा वर्ग, खासकर जनरेशन-ज़ी, सरकार की नीतियों और भ्रष्टाचार के खिलाफ लंबे समय से आंदोलन कर रहा था। लेकिन हाल के दिनों में यह आंदोलन इतना उग्र हो गया कि प्रशासन की पकड़ पूरी तरह ढीली पड़ गई। आंदोलनकारियों ने कई सरकारी इमारतों को आग के हवाले कर दिया, जिससे न केवल संपत्ति का नुकसान हुआ बल्कि कई जरूरी दस्तावेज और अभिलेख भी राख में तब्दील हो गए।
प्रधानमंत्री ने स्वीकार किया कि मौजूदा स्थिति बेहद चुनौतीपूर्ण है और सरकार के पास न तो संसाधन बचे हैं और न ही ठोस प्रशासनिक ढांचा। उन्होंने कहा कि “जब एक राज्य अपने दस्तावेज, रिकॉर्ड और प्रशासनिक संरचना खो देता है, तो वह शून्य यानी जीरो स्टेट की स्थिति में पहुंच जाता है, और नेपाल आज उसी मोड़ पर खड़ा है।” उनकी इस टिप्पणी ने एक बार फिर यह दिखा दिया कि देश किस हद तक संकट में डूब चुका है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नेपाल में यह असंतोष नई पीढ़ी के भीतर लंबे समय से पल रहा था। बेरोजगारी, आर्थिक असमानता और भ्रष्टाचार ने युवाओं का भरोसा पूरी तरह से खत्म कर दिया। जनरेशन-ज़ी आंदोलन का मकसद सरकार से जवाबदेही और पारदर्शिता की मांग था, लेकिन सरकार की नाकामी और ढीले रवैये के चलते यह आंदोलन हिंसक हो गया। नतीजतन, जिस ऊर्जा से देश का भविष्य संवरना चाहिए था, वही आग और राख में तब्दील हो गई।
नेपाल का प्रशासनिक ढांचा लगातार कमजोर होता जा रहा है। अदालतों, मंत्रालयों और विभिन्न सरकारी विभागों की इमारतें जलकर खाक हो चुकी हैं। इससे देश में न्याय व्यवस्था, शिक्षा प्रणाली और स्वास्थ्य ढांचे तक पर गंभीर असर पड़ा है। अभिलेखों और डॉक्यूमेंट्स के जल जाने से नागरिकों की पहचान, संपत्ति रजिस्टर और सरकारी योजनाओं का पूरा रिकॉर्ड नष्ट हो चुका है। इसका सीधा असर आम जनता पर पड़ रहा है, क्योंकि सरकारी दस्तावेजों के बिना उन्हें अपने अधिकार साबित करने में मुश्किल होगी।
प्रधानमंत्री ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से भी मदद की अपील की है। उन्होंने कहा कि नेपाल अकेले इस संकट से बाहर नहीं निकल सकता और उसे अपने मित्र देशों का सहयोग चाहिए। हालांकि, सवाल यह भी उठ रहे हैं कि क्या सरकार इस संकट से निपटने के लिए ठोस कदम उठा पाएगी, या यह स्थिति लंबे समय तक नेपाल को अराजकता में डुबोए रखेगी।
नेपाल के हालात को देखकर विशेषज्ञ यह भी चेतावनी दे रहे हैं कि अगर स्थिति जल्द संभाली नहीं गई तो यह संकट पूरे दक्षिण एशिया के क्षेत्रीय स्थिरता पर असर डाल सकता है। जनरेशन-ज़ी आंदोलन का यह ज्वालामुखी सिर्फ नेपाल सरकार को चुनौती नहीं दे रहा, बल्कि पड़ोसी देशों और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए भी चिंता का कारण बन चुका है। सवाल यह है कि क्या नेपाल इस शून्य स्थिति से खुद को दोबारा खड़ा कर पाएगा, या फिर आने वाले समय में यह संकट और गहराएगा।



