
अल्पसंख्यकों की स्थिति को लेकर भारत पर सवाल उठाने वाले पाकिस्तान को भारत ने दो टूक और सख्त जवाब दिया है। भारत ने साफ शब्दों में कहा है कि किसी दूसरे देश पर टिप्पणी करने से पहले पाकिस्तान को अपने भीतर झांककर देखना चाहिए। पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की स्थिति किसी से छिपी नहीं है और वहां धार्मिक, जातीय व भाषाई अल्पसंख्यक लंबे समय से उत्पीड़न, भेदभाव और हिंसा का सामना कर रहे हैं। ऐसे में भारत को उपदेश देना पाकिस्तान के लिए न केवल अनुचित है, बल्कि दोहरे मापदंडों को भी दर्शाता है।
भारत सरकार ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह स्पष्ट किया है कि भारत एक लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और समावेशी देश है, जहां संविधान सभी नागरिकों को समान अधिकार देता है। भारत में अल्पसंख्यकों को धार्मिक स्वतंत्रता, सांस्कृतिक संरक्षण और कानूनी सुरक्षा प्राप्त है। इसके विपरीत पाकिस्तान में हिंदू, सिख, ईसाई, अहमदिया और शिया समुदायों के साथ होने वाले अत्याचारों की रिपोर्टें अक्सर सामने आती रहती हैं। जबरन धर्मांतरण, अल्पसंख्यक लड़कियों की जबरन शादियां, पूजा स्थलों पर हमले और भेदभावपूर्ण कानून पाकिस्तान की वास्तविकता को उजागर करते हैं।
भारत ने यह भी कहा कि पाकिस्तान मानवाधिकारों की आड़ में भारत के आंतरिक मामलों में दखल देने की कोशिश करता रहा है, जबकि उसे पहले अपने देश में मानवाधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए। भारत का रुख स्पष्ट है कि अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और सशक्तिकरण उसकी प्राथमिकता रही है और यह केवल बयानबाजी तक सीमित नहीं, बल्कि नीतियों और कानूनों में भी दिखाई देता है।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय को भी यह समझना चाहिए कि पाकिस्तान की टिप्पणियां अक्सर ध्यान भटकाने की रणनीति होती हैं, ताकि वह अपने घरेलू संकटों, आर्थिक बदहाली और आंतरिक अस्थिरता से नजरें हटा सके। भारत ने दोहराया कि वह मानवाधिकारों पर सार्थक और ईमानदार संवाद का समर्थन करता है, लेकिन यह संवाद तभी विश्वसनीय होगा जब आलोचना करने वाला देश खुद अपने रिकॉर्ड को दुरुस्त करे।
अंततः भारत का संदेश स्पष्ट है—अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर सवाल उठाने से पहले पाकिस्तान को अपने घर की स्थिति सुधारनी चाहिए। भारत न तो किसी के प्रमाणपत्र की जरूरत महसूस करता है और न ही निराधार आरोपों से विचलित होता है।

