
पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के गाजा पीस बोर्ड में भारत के साथ-साथ पाकिस्तान को शामिल किए जाने की खबर अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कई अहम संकेत देती है। गाजा संघर्ष लंबे समय से मध्य-पूर्व की अस्थिरता का बड़ा कारण रहा है और इसमें वैश्विक शक्तियों की दिलचस्पी नई नहीं है। भारत का नाम इस बोर्ड में आना उसके बढ़ते वैश्विक कद, संतुलित विदेश नीति और मानवीय सहायता के अनुभव को दर्शाता है। भारत पारंपरिक रूप से फिलिस्तीन मुद्दे पर मानवीय दृष्टिकोण अपनाता रहा है, साथ ही इजरायल के साथ भी उसके रणनीतिक संबंध हैं। ऐसे में भारत एक संतुलनकारी भूमिका निभा सकता है, जो बातचीत और शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में मददगार हो। वहीं पाकिस्तान की मौजूदगी इस पूरे घटनाक्रम को और जटिल बनाती है। पाकिस्तान लंबे समय से खुद को मुस्लिम देशों के मुद्दों का पैरोकार बताता रहा है और फिलिस्तीन के समर्थन में मुखर रहा है। गाजा पीस बोर्ड में उसका शामिल होना इस बात का संकेत है कि ट्रंप या उनके समर्थक इस मंच को व्यापक प्रतिनिधित्व देना चाहते हैं, ताकि मुस्लिम दुनिया में इसकी स्वीकार्यता बढ़ सके। भारत और पाकिस्तान दोनों का एक ही मंच पर होना दक्षिण एशियाई कूटनीति के लिहाज से भी दिलचस्प है, क्योंकि दोनों देशों के आपसी संबंध तनावपूर्ण रहे हैं। ऐसे में यह मंच परोक्ष रूप से संवाद का अवसर भी बन सकता है, हालांकि इसका सीधा असर द्विपक्षीय रिश्तों पर पड़ेगा या नहीं, यह कहना अभी जल्दबाजी होगी। इसके अलावा, ट्रंप के इस कदम को उनकी वैश्विक शांति-निर्माता की छवि से भी जोड़कर देखा जा रहा है, जिसे वे अपने राजनीतिक एजेंडे में इस्तेमाल कर सकते हैं। गाजा पीस बोर्ड में भारत और पाकिस्तान की मौजूदगी यह दिखाती है कि मध्य-पूर्व का मुद्दा अब केवल क्षेत्रीय नहीं रहा, बल्कि इसमें एशिया की बड़ी ताकतों की भी भूमिका बढ़ रही है। कुल मिलाकर, इस फैसले के मायने यही हैं कि गाजा शांति प्रक्रिया को बहुपक्षीय बनाने की कोशिश हो रही है, जहां अलग-अलग हितों और नजरियों को एक मंच पर लाकर समाधान तलाशा जाए। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि यह बोर्ड वास्तविक शांति की दिशा में कितना ठोस कदम उठा पाता है।



