
भारत के प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने न्याय प्रणाली को अधिक मानवीय, सुलभ और समावेशी बनाने पर जोर देते हुए कहा कि अदालतों का दरवाजा समाज के आखिरी पायदान पर खड़े व्यक्ति के लिए भी उतना ही खुला होना चाहिए जितना संसाधनों से संपन्न लोगों के लिए होता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि लोकतंत्र की मजबूती तभी संभव है जब न्याय केवल कागजों में नहीं, बल्कि व्यवहार में भी सबको समान रूप से उपलब्ध हो। उनके अनुसार न्याय तक पहुंच में आर्थिक, सामाजिक या भौगोलिक बाधाएं नहीं आनी चाहिए। तकनीक, कानूनी सहायता तंत्र और न्यायिक सुधारों के माध्यम से आम नागरिक को राहत पहुंचाना समय की जरूरत है।
सीजेआई ने यह भी रेखांकित किया कि न्याय में देरी, न्याय से वंचित करने के समान है। इसलिए अदालतों की जिम्मेदारी है कि वे प्रक्रियाओं को सरल बनाएं और मामलों के निपटारे में तेजी लाएं। उन्होंने गरीबों, श्रमिकों, महिलाओं और ग्रामीण समुदायों का विशेष उल्लेख करते हुए कहा कि इन्हें कानूनी जानकारी और संसाधनों की सबसे अधिक आवश्यकता होती है। अगर न्याय व्यवस्था इन्हें केंद्र में रखकर काम करती है, तभी संविधान की भावना सही अर्थों में पूरी होगी। उन्होंने युवा वकीलों और न्यायिक अधिकारियों से अपील की कि वे सेवा की भावना से प्रेरित होकर काम करें।
प्रधान न्यायाधीश ने डिजिटल प्लेटफॉर्म, ई-कोर्ट्स और वर्चुअल सुनवाई जैसी व्यवस्थाओं को न्याय की पहुंच बढ़ाने में अहम बताया। उनका मानना है कि तकनीक के सही उपयोग से दूरदराज के इलाकों में रहने वाले लोगों को भी बड़ी राहत मिल सकती है। साथ ही, उन्होंने यह भी कहा कि तकनीकी बदलाव के साथ संवेदनशीलता बनाए रखना जरूरी है, ताकि कोई भी व्यक्ति व्यवस्था से कटे नहीं। न्याय केवल कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि भरोसे का तंत्र है।
अपने संबोधन के अंत में सीजेआई सूर्यकांत ने दोहराया कि न्यायपालिका का उद्देश्य विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग की सेवा करना नहीं, बल्कि हर उस नागरिक को संरक्षण देना है जिसे इसकी जरूरत है। जब अंतिम व्यक्ति को न्याय मिलने लगेगा, तभी देश की न्याय व्यवस्था पर विश्वास और मजबूत होगा। उनका यह संदेश आने वाले समय में न्यायिक सुधारों की दिशा तय करने वाला माना जा रहा है।



