
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में तमिलनाडु सरकार द्वारा मुफ्त खाने, बिजली और साइकिल जैसी सुविधाओं के वितरण को लेकर कड़ी टिप्पणी की है। अदालत ने इस पर चिंता व्यक्त की कि मुफ्त सुविधाओं का यह प्रचलन लोकतांत्रिक मूल्य और वित्तीय अनुशासन के लिए हानिकारक हो सकता है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि इस तरह की योजनाएं जनता को तत्काल राहत तो देती हैं, लेकिन दीर्घकालीन आर्थिक स्थिरता और राज्य के बजट पर विपरीत प्रभाव डाल सकती हैं। अदालत ने यह भी कहा कि “मुफ्त खाने, बिजली और साइकिल जैसी योजनाओं को केवल वोट बैंक बनाने के लिए उपयोग करना लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।”
तमिलनाडु सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में यह प्रयास किया है कि हर गरीब और जरूरतमंद व्यक्ति को बुनियादी सुविधाएँ प्रदान की जाएं। इसमें मुफ्त राशन, सब्सिडी वाली बिजली, साइकिल वितरण और अन्य लाभ शामिल हैं। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इसे ‘Freebies कल्चर’ के रूप में परिभाषित किया और चेतावनी दी कि यह लोकतांत्रिक राजनीति में गलत संदेश देता है। अदालत ने यह संकेत दिया कि यदि यह प्रवृत्ति बढ़ती रही, तो राज्यों के वित्तीय संसाधनों पर भारी दबाव पड़ सकता है और यह लंबे समय में गरीबों की भलाई के बजाय केवल राजनीतिक लाभ के लिए उपयोग हो सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि Freebies कल्चर का प्रभाव राजनीति और समाज दोनों पर दिखाई देता है। राजनीतिक दल इसे चुनावी लाभ के लिए उपयोग करते हैं, जिससे जनता अस्थायी लाभ प्राप्त करती है, लेकिन इसका दीर्घकालिक सामाजिक और आर्थिक असर नकारात्मक होता है। सुप्रीम कोर्ट ने सरकारों से यह भी आग्रह किया कि वे इन योजनाओं को संतुलित तरीके से लागू करें और दीर्घकालीन विकास और शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी आवश्यक सेवाओं पर ध्यान दें।



