
पाकिस्तानी सेना और तालिबानी लड़ाकों के बीच बढ़ता तनाव दक्षिण एशिया की सुरक्षा के लिए एक बड़ी चिंता बन चुका है। एक तरफ परमाणु शक्ति संपन्न देश पाकिस्तान है, जिसकी सेना आधुनिक हथियारों, फाइटर जेट्स, ड्रोन और भारी सैन्य संसाधनों से लैस है, वहीं दूसरी ओर अफगानिस्तान में सत्ता पर काबिज तालिबान के लड़ाके हैं, जो गुरिल्ला युद्ध और पहाड़ी इलाकों में लड़ाई के माहिर माने जाते हैं। तकनीकी रूप से मजबूत होने के बावजूद पाकिस्तान के लिए यह संघर्ष आसान नहीं है।
अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच की डूरंड रेखा लंबे समय से विवाद का विषय रही है। तालिबान इस सीमा को औपचारिक अंतरराष्ट्रीय सीमा के रूप में मान्यता नहीं देता, जबकि पाकिस्तान इसे अपनी वैध सीमा बताता है। यही विवाद अक्सर सीमा पार झड़पों और तनाव को जन्म देता है। सीमा क्षेत्र का दुर्गम भूगोल पाकिस्तानी सेना की पारंपरिक सैन्य ताकत को सीमित कर देता है, जबकि तालिबानी लड़ाके इन पहाड़ी इलाकों से भली-भांति परिचित हैं।
सबसे बड़ी चुनौती यह है कि तालिबान पारंपरिक युद्ध नहीं लड़ता। वे हिट-एंड-रन रणनीति अपनाते हैं, छोटे समूहों में हमला करते हैं और फिर पहाड़ों में गायब हो जाते हैं। अफगानिस्तान में दशकों तक सोवियत संघ और अमेरिका जैसी महाशक्तियों से लड़ने का अनुभव उन्हें मिला है। ऐसे में केवल आधुनिक हथियार होना जीत की गारंटी नहीं देता।
इसके अलावा, पाकिस्तान के अंदर भी तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) जैसे संगठन सक्रिय हैं, जिन्हें अफगान तालिबान से वैचारिक सहानुभूति मिलती रही है। इससे इस संघर्ष का दायरा सीमित सीमा विवाद से बढ़कर आंतरिक सुरक्षा संकट तक पहुंच जाता है।
राजनीतिक और कूटनीतिक स्तर पर भी स्थिति जटिल है। अफगानिस्तान में तालिबान सरकार को अंतरराष्ट्रीय मान्यता सीमित रूप से मिली है, लेकिन क्षेत्रीय समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। चीन, ईरान और रूस जैसे देश अफगानिस्तान में अपने हित साधने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे पाकिस्तान पर अतिरिक्त दबाव बनता है।
कुल मिलाकर, आधुनिक हथियारों से लैस होने के बावजूद पाकिस्तान के लिए अफगानिस्तान एक बड़ी रणनीतिक चुनौती बना हुआ है। यह केवल सैन्य ताकत का नहीं, बल्कि भूगोल, विचारधारा, स्थानीय समर्थन और क्षेत्रीय राजनीति का जटिल समीकरण है, जिसे सुलझाना आसान नहीं दिखता।



