
साल 1965 और 1971 के भारत-पाक युद्ध दक्षिण एशिया के इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण सैन्य संघर्षों में गिने जाते हैं। 1965 के युद्ध के दौरान पाकिस्तान को कई इस्लामिक देशों से नैतिक और सीमित सामरिक समर्थन मिला था, जिनमें उस समय के ईरान के शाह Mohammad Reza Pahlavi की सरकार भी शामिल थी। उस दौर में ईरान और पाकिस्तान के संबंध क्षेत्रीय सुरक्षा और पश्चिमी खेमे की राजनीति के कारण काफी मजबूत थे। कहा जाता है कि ईरान ने पाकिस्तान को ईंधन और कुछ सैन्य साजो-सामान उपलब्ध कराया, हालांकि उसने सीधे युद्ध में हिस्सा नहीं लिया। इसके बावजूद भारतीय सेना ने पश्चिमी और उत्तरी मोर्चों पर मजबूती से जवाब दिया और पाकिस्तान की रणनीति को नाकाम कर दिया। 1965 का युद्ध अंततः सोवियत मध्यस्थता के बाद Tashkent Agreement के जरिए समाप्त हुआ, जिसने यह स्पष्ट कर दिया कि भारत किसी भी बाहरी समर्थन के बावजूद अपने हितों की रक्षा करने में सक्षम है।
1971 का युद्ध तो और भी निर्णायक साबित हुआ। पूर्वी पाकिस्तान में राजनीतिक संकट और मानवीय त्रासदी के बाद भारत ने हस्तक्षेप किया, जिसके परिणामस्वरूप बांग्लादेश का गठन हुआ। इस संघर्ष के दौरान भी ईरान ने पाकिस्तान के साथ कूटनीतिक सहानुभूति दिखाई, क्योंकि उस समय क्षेत्रीय समीकरण पाकिस्तान के पक्ष में थे। लेकिन भारतीय सेना की रणनीतिक तैयारी, थल, जल और वायु सेनाओं के समन्वित अभियान और पूर्वी मोर्चे पर तेज कार्रवाई ने मात्र 13 दिनों में पाकिस्तान को आत्मसमर्पण के लिए मजबूर कर दिया। 16 दिसंबर 1971 को ढाका में पाकिस्तानी सेना ने आत्मसमर्पण किया और एक नए राष्ट्र बांग्लादेश का उदय हुआ। इस युद्ध ने यह साबित कर दिया कि भारत केवल सैन्य शक्ति ही नहीं, बल्कि रणनीतिक और कूटनीतिक कौशल में भी मजबूत है।
इन दोनों युद्धों ने दक्षिण एशिया की भू-राजनीति को बदल दिया। जहां एक ओर ईरान उस समय पाकिस्तान के करीब था, वहीं बाद के दशकों में भारत और ईरान के संबंधों में भी उल्लेखनीय सुधार हुआ। आज दोनों देश ऊर्जा, व्यापार और क्षेत्रीय संपर्क जैसे मुद्दों पर सहयोग कर रहे हैं। इतिहास के इन अध्यायों से यह स्पष्ट होता है कि अंतरराष्ट्रीय समर्थन और विरोध के बीच भी भारत ने अपनी संप्रभुता और शक्ति का परिचय दिया और विश्व मंच पर अपनी स्थिति को मजबूत किया।



