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यूरिया सब्सिडी पर बढ़ा सरकारी खर्च

देश में किसानों को सस्ती दरों पर यूरिया उपलब्ध कराने के लिए सरकार भारी सब्सिडी खर्च कर रही है। रिपोर्टों के अनुसार, एक बोरी यूरिया पर सब्सिडी का बोझ लगभग ₹4500 तक पहुंच गया है। इसी बढ़ते वित्तीय दबाव के बीच उर्वरक मंत्रालय ने वित्त मंत्रालय से करीब ₹3.4 लाख करोड़ की राशि उपलब्ध कराने का अनुरोध किया है।

भारत में किसानों को नियंत्रित कीमत पर यूरिया उपलब्ध कराया जाता है, जबकि इसके उत्पादन और आयात की वास्तविक लागत काफी अधिक होती है। लागत और बिक्री मूल्य के बीच का अंतर सरकार सब्सिडी के रूप में वहन करती है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्राकृतिक गैस और उर्वरक कच्चे माल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का सीधा असर सब्सिडी खर्च पर पड़ता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि सब्सिडी व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य किसानों को कृषि लागत से राहत देना और खाद की उपलब्धता सुनिश्चित करना है। यदि सरकार यह सहायता न दे, तो किसानों को उर्वरकों के लिए कहीं अधिक कीमत चुकानी पड़ सकती है।

कृषि अर्थशास्त्रियों के अनुसार बढ़ती सब्सिडी सरकार के वित्तीय बोझ को बढ़ाती है, लेकिन इससे किसानों को नियंत्रित दरों पर उर्वरक उपलब्ध कराने में मदद मिलती है। यही कारण है कि उर्वरक सब्सिडी को कृषि क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण समर्थन माना जाता है।

किसानों के लिए फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यूरिया की उपलब्धता और उसकी नियंत्रित कीमत बनाए रखने की दिशा में सरकार प्रयासरत है। हालांकि सब्सिडी पर बढ़ता खर्च भविष्य में उर्वरक नीति और कृषि सहायता कार्यक्रमों को लेकर नई चर्चाओं को जन्म दे सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि दीर्घकाल में उर्वरक उपयोग की दक्षता बढ़ाने, वैकल्पिक पोषक तत्वों को बढ़ावा देने और कृषि सुधारों के जरिए सब्सिडी बोझ को संतुलित करने की दिशा में भी काम करने की आवश्यकता है।

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