अंतिम यात्रा में ‘राम नाम सत्य है’ क्यों बोला जाता है? शिव का नाम क्यों नहीं लिया जाता, जानिए धार्मिक मान्यता

हिंदू धर्म में किसी व्यक्ति की अंतिम यात्रा के दौरान अक्सर ‘राम नाम सत्य है’ का उद्घोष किया जाता है। यह केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि जीवन और मृत्यु के गहरे आध्यात्मिक सत्य की याद दिलाने वाला संदेश माना जाता है। कई लोगों के मन में प्रश्न उठता है कि अंतिम यात्रा में भगवान राम का नाम क्यों लिया जाता है और भगवान शिव का नाम क्यों नहीं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ‘राम नाम सत्य है’ का अर्थ है कि इस संसार में यदि कुछ शाश्वत और सत्य है, तो वह ईश्वर का नाम है। शरीर नश्वर है, धन-दौलत और सांसारिक संबंध अस्थायी हैं, लेकिन परमात्मा और उसका स्मरण ही शाश्वत माना गया है। इसलिए अंतिम यात्रा में यह उद्घोष जीवित लोगों को भी जीवन के सत्य का स्मरण कराता है।
सनातन परंपरा में भगवान राम को धर्म, मर्यादा और सत्य का प्रतीक माना जाता है। इसी कारण ‘राम नाम सत्य है’ वाक्य समय के साथ अंतिम यात्रा का अभिन्न हिस्सा बन गया। यह मृत आत्मा की शांति की कामना के साथ-साथ जीवन की क्षणभंगुरता का संदेश भी देता है।
जहां तक भगवान शिव का प्रश्न है, हिंदू धर्म में शिव को भी मृत्यु और मोक्ष के देवता के रूप में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। कई क्षेत्रों में अंतिम संस्कार और मृत्यु संबंधी कर्मकांडों में शिव मंत्रों, महामृत्युंजय मंत्र और ‘हर हर महादेव’ का भी उच्चारण किया जाता है। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि मृत्यु से जुड़े संस्कारों में शिव का नाम नहीं लिया जाता।
वास्तव में ‘राम नाम सत्य है’ एक विशेष परंपरा और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति बन चुकी है, जबकि शिव उपासना भी अंतिम संस्कारों और मोक्ष संबंधी मान्यताओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। अलग-अलग क्षेत्रों और परंपराओं में इन प्रथाओं में कुछ भिन्नताएं देखने को मिल सकती हैं।
धार्मिक विद्वानों के अनुसार अंतिम यात्रा में राम नाम का उच्चारण जीवित लोगों को यह संदेश देता है कि जीवन अस्थायी है और अंततः ईश्वर का स्मरण ही सबसे बड़ा सत्य माना जाता है।
नोट: यह लेख धार्मिक मान्यताओं और पारंपरिक विश्वासों पर आधारित है। विभिन्न संप्रदायों और क्षेत्रों में परंपराएं अलग-अलग हो सकती हैं।



