
अमेरिका में एक बार फिर से शटडाउन हो गया है और यह करीब 6 साल बाद हुआ है। “शटडाउन” का सीधा अर्थ है कि अमेरिकी सरकार के पास अपने सरकारी खर्च चलाने के लिए पर्याप्त फंड नहीं बचे हैं। जब अमेरिकी कांग्रेस (संसद) समय पर बजट या अस्थायी फंडिंग बिल पास नहीं कर पाती, तो सरकार के कई विभागों और सेवाओं को बंद करना पड़ता है। इसका सीधा असर लाखों सरकारी कर्मचारियों और आम जनता की सेवाओं पर पड़ता है।
शटडाउन के दौरान जरूरी सेवाएं जैसे सुरक्षा, सेना, एयर ट्रैफिक कंट्रोल, पुलिस और स्वास्थ्य सेवाएं सीमित रूप से चलती रहती हैं, लेकिन कई विभाग जैसे शिक्षा, पर्यावरण, संग्रहालय, पासपोर्ट जारी करने जैसी प्रक्रियाएं प्रभावित हो जाती हैं। इस दौरान गैर-जरूरी माने जाने वाले सरकारी कर्मचारी बिना वेतन के घर बैठने को मजबूर हो जाते हैं। हालांकि, शटडाउन खत्म होने पर अक्सर उनका बकाया वेतन दे दिया जाता है, लेकिन तब तक आर्थिक परेशानी बनी रहती है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, शटडाउन का असर केवल अमेरिकी नागरिकों तक ही सीमित नहीं रहता बल्कि पूरी दुनिया पर पड़ सकता है। अमेरिका की अर्थव्यवस्था सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और यहां के आर्थिक फैसले शेयर बाजार से लेकर अंतरराष्ट्रीय व्यापार तक को प्रभावित करते हैं। शटडाउन की वजह से निवेशकों में असुरक्षा की भावना बढ़ती है और विदेशी कंपनियां भी अमेरिकी बाजार में निवेश को लेकर सतर्क हो जाती हैं।
इस बार का शटडाउन अमेरिकी कांग्रेस में बजट पास न होने और राजनीतिक दलों के बीच टकराव के कारण हुआ है। रिपब्लिकन और डेमोक्रेट नेताओं के बीच खर्चों को लेकर सहमति नहीं बन पाई, जिसकी वजह से यह स्थिति पैदा हुई। राष्ट्रपति और संसद के बीच खींचतान का खामियाजा आम जनता और सरकारी कर्मचारियों को भुगतना पड़ रहा है।
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि अगर यह शटडाउन लंबा खिंचता है तो अमेरिकी जीडीपी पर असर पड़ेगा और बेरोजगारी बढ़ सकती है। वहीं, अगर राजनीतिक दल जल्द ही सहमति पर पहुंच जाते हैं तो नुकसान सीमित रह सकता है।
कुल मिलाकर, अमेरिकी शटडाउन केवल एक राजनीतिक विवाद नहीं बल्कि एक गंभीर आर्थिक संकट भी है, जिसका असर अमेरिका के साथ-साथ पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।



