
कनाडा सरकार ने हाल ही में एक बड़ा कबूलनामा करते हुए यह स्वीकार किया है कि देश में खालिस्तानी संगठनों को फंडिंग मिल रही है। इस खुलासे ने भारत-कनाडा संबंधों में एक बार फिर नई हलचल पैदा कर दी है। लंबे समय से भारत लगातार यह आरोप लगाता रहा है कि कनाडा में खालिस्तान समर्थक संगठनों को न केवल राजनीतिक संरक्षण मिलता है, बल्कि वहां की सरकार और प्रशासन की ढिलाई के चलते उन्हें आर्थिक सहायता भी उपलब्ध होती है। अब जब कनाडा सरकार ने खुद इस बात को मान लिया है, तो यह साफ हो गया है कि भारत की आशंकाएं निराधार नहीं थीं।
खालिस्तानी आंदोलन की जड़ें पंजाब से जुड़ी रही हैं, लेकिन बीते कुछ दशकों में इसका असर विदेशों तक फैल गया। खासकर कनाडा, ब्रिटेन और अमेरिका जैसे देशों में बड़ी संख्या में पंजाबी मूल के प्रवासी रहते हैं, जिनमें से कुछ लोग खालिस्तान की विचारधारा को आगे बढ़ाने वाले संगठनों से जुड़े हुए हैं। भारत ने कई बार कूटनीतिक स्तर पर कनाडा को चेताया कि ऐसे संगठनों की गतिविधियां भारत की संप्रभुता और सुरक्षा के लिए खतरा हैं। इसके बावजूद वहां खुलकर रैलियां, प्रदर्शन और आर्थिक फंडिंग जारी रही।
कनाडा सरकार का यह स्वीकारोक्ति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि हाल ही में भारत और कनाडा के बीच खालिस्तान समर्थक गतिविधियों को लेकर गंभीर मतभेद देखने को मिले। भारत ने कई बार यह मुद्दा उठाया कि कनाडा में रह रहे खालिस्तानी न केवल भारत विरोधी माहौल बना रहे हैं बल्कि युवाओं को गुमराह करके हिंसा और आतंकवाद की ओर धकेल रहे हैं। दूसरी ओर, कनाडा सरकार अक्सर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हवाला देती रही। लेकिन अब जब उन्होंने फंडिंग के सवाल को मान लिया है, तो यह कनाडा की अपनी ही नीति पर सवाल खड़ा करता है।
यह मामला केवल भारत-कनाडा संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद और सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ है। अगर किसी देश में आतंकी सोच रखने वाले संगठनों को खुलकर आर्थिक मदद मिलती है, तो वह न केवल उस देश के लिए बल्कि पूरी दुनिया के लिए खतरा है। यही वजह है कि भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी खालिस्तान समर्थक गतिविधियों को लेकर चिंता जताई है और सख्त कदम उठाने की मांग की है।
कनाडा सरकार का यह कबूलनामा अब भारत की कूटनीतिक ताकत को और मजबूत करता है। भारत इस मुद्दे को वैश्विक स्तर पर उठाकर यह साबित कर सकता है कि आतंकवाद या अलगाववादी गतिविधियों के लिए फंडिंग कहीं भी हो, उसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। आने वाले दिनों में संभव है कि दोनों देशों के रिश्तों पर इसका गहरा असर पड़े और कनाडा को अपने यहां मौजूद ऐसे संगठनों पर सख्त कार्रवाई करनी पड़े।
संक्षेप में, कनाडा सरकार की यह स्वीकारोक्ति न केवल भारत की चिंता को सही साबित करती है, बल्कि यह संदेश भी देती है कि किसी भी राष्ट्र की संप्रभुता से समझौता नहीं किया जा सकता। खालिस्तानी संगठनों को फंडिंग का मुद्दा अब केवल राजनीतिक बहस तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा का अहम सवाल बन चुका है।



