चीन की सरकार एक बार फिर मानवाधिकारों के गंभीर उल्लंघन के आरोपों के घेरे में है, और इस बार मामला है तिब्बती बच्चों की जबरन स्कूली कैद का। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों और संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट्स के अनुसार, 10 लाख से भी अधिक तिब्बती बच्चों को उनकी मातृभाषा, धर्म और संस्कृति से दूर करके “बोर्डिंग स्कूलों” में रखा जा रहा है। इन स्कूलों को इस तरह संचालित किया जा रहा है जैसे ये सुधारगृह हों, जहां बच्चों को ना तो तिब्बती भाषा सिखाई जाती है, ना ही उन्हें अपने धर्म—बौद्ध धर्म—का अभ्यास करने दिया जाता है।
इन स्कूलों में रहने वाले बच्चों को चीनी भाषा (मंदारिन) में शिक्षा दी जाती है और वहां के सिलेबस में तिब्बत के इतिहास, धर्म और संस्कृति का नामोनिशान तक नहीं होता। बच्चों को महीनों तक अपने माता-पिता और गांव से मिलने नहीं दिया जाता, जिससे वे धीरे-धीरे अपनी 4500 साल पुरानी सांस्कृतिक विरासत से कटते जा रहे हैं। विश्लेषकों का मानना है कि यह चीन की एक सुनियोजित रणनीति है, जिसका मकसद है – तिब्बती पहचान को धीरे-धीरे मिटा देना, ताकि आने वाली पीढ़ियां “चीनी नागरिक” बनें, न कि “तिब्बती”।
शी जिनपिंग सरकार द्वारा संचालित यह नीति “सांस्कृतिक नरसंहार” (Cultural Genocide) के अंतर्गत आती है। संयुक्त राष्ट्र और कई स्वतंत्र रिपोर्ट्स में बताया गया है कि बच्चों को जिस माहौल में रखा जा रहा है वह न केवल उनकी मानसिकता को प्रभावित कर रहा है बल्कि उनमें गहरे सामाजिक और मनोवैज्ञानिक असर भी छोड़ रहा है। उन्हें बौद्ध धर्म का अभ्यास करने नहीं दिया जाता, तिब्बती पोशाक पहनने से रोका जाता है, यहां तक कि तिब्बती भाषा बोलने पर दंड तक दिया जाता है।
पश्चिमी देशों में मानवाधिकार संगठनों ने इस पर गहरी चिंता व्यक्त की है और इसे यूएन कन्वेंशन ऑन द राइट्स ऑफ द चाइल्ड का उल्लंघन बताया है। इसके बावजूद चीन अपनी नीति को “राष्ट्र के एकीकरण” और “देशभक्ति शिक्षा” के नाम पर सही ठहराता है।
तिब्बती समुदाय, विशेष रूप से निर्वासन में रहने वाले लामा और धर्मगुरु, इस स्थिति को लेकर लगातार विरोध दर्ज करा रहे हैं। वे इसे एक “शांत लेकिन विनाशकारी युद्ध” मानते हैं, जो बंदूकों से नहीं, बल्कि भाषा, शिक्षा और संस्कृति को मिटाकर लड़ा जा रहा है।
यह केवल तिब्बत की बात नहीं है, बल्कि यह पूरी दुनिया के लिए चेतावनी है कि जब एक प्राचीन संस्कृति को दबाया जाता है, तो मानवता का एक महत्वपूर्ण हिस्सा खो जाता है। आने वाले समय में यह संघर्ष न केवल तिब्बती अस्मिता के लिए होगा, बल्कि यह वैश्विक मानवाधिकारों और सांस्कृतिक स्वतंत्रता की रक्षा की परीक्षा भी होगा।



