
टैरिफ अटैक और वैश्विक दबावों के बावजूद भारत लगातार रूस से सबसे अधिक तेल खरीद रहा है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में उतार-चढ़ाव और पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए विभिन्न प्रतिबंधों के बीच भी भारत ने अपने ऊर्जा हितों को प्राथमिकता देते हुए रूस से कच्चे तेल की आयात नीति को बरकरार रखा है। हालिया आंकड़ों के अनुसार, भारत की कुल कच्चे तेल की जरूरत का करीब 35% हिस्सा अब रूस से पूरा हो रहा है, जो किसी भी अन्य देश से कहीं अधिक है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की यह रणनीति पूरी तरह से आर्थिक दृष्टिकोण से प्रेरित है। रूस से आने वाला तेल अन्य बाजारों की तुलना में 20-25% तक सस्ता पड़ता है, जिससे देश की ऊर्जा लागत कम होती है और मुद्रास्फीति पर नियंत्रण बना रहता है। पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए ‘टैरिफ अटैक’ यानी अतिरिक्त कर और मूल्य नियंत्रण के बावजूद भारत ने रूस से तेल खरीदने की प्रक्रिया को जारी रखा है, क्योंकि इससे देश के ऊर्जा संतुलन और बजटीय स्थिरता में मदद मिलती है।
भारतीय रिफाइनरियां भी रूसी कच्चे तेल पर अधिक निर्भर होती जा रही हैं। निजी कंपनियों के साथ-साथ सरकारी उपक्रमों जैसे इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम ने भी रूस से दीर्घकालिक अनुबंधों पर हस्ताक्षर किए हैं। इससे न केवल ऊर्जा सुरक्षा मजबूत हुई है बल्कि व्यापारिक संबंधों में भी नई गहराई आई है।
रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद जब यूरोपीय देशों ने रूसी तेल पर पाबंदियां लगाईं, तो भारत ने उस अवसर का लाभ उठाते हुए बड़ी मात्रा में रियायती दरों पर तेल खरीदा। इससे भारत न केवल अपने घरेलू बाजार की मांग पूरी कर रहा है बल्कि पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात में भी बढ़त बना रहा है।
सारांश में कहा जा सकता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक दबावों और टैरिफ चुनौतियों के बावजूद भारत ने अपने ऊर्जा हितों को सर्वोपरि रखा है। यह नीति देश की आर्थिक मजबूती और दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो रही है।



