
शंघाई सहयोग संगठन (SCO) की बैठक से ठीक पहले रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने अमेरिका और पश्चिमी देशों को तीखा संदेश देते हुए साफ कहा है कि “रूस किसी भी प्रकार के भेदभावपूर्ण प्रतिबंधों को स्वीकार नहीं करेगा।” पुतिन ने अमेरिका की एकतरफा नीतियों और दबाव की राजनीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि आज की दुनिया बहुध्रुवीय हो रही है, और ऐसे समय में एकतरफा प्रतिबंध केवल असंतुलन पैदा करते हैं। उन्होंने यह भी जोड़ा कि रूस की प्राथमिकता अब उन देशों के साथ साझेदारी को मजबूत करना है जो आपसी सम्मान और समानता के सिद्धांतों पर चलते हैं।
पुतिन का यह बयान ऐसे समय में आया है जब SCO बैठक में कई अहम मुद्दों पर चर्चा होनी है। माना जा रहा है कि इस बैठक में आर्थिक सहयोग, सुरक्षा, ऊर्जा साझेदारी और क्षेत्रीय स्थिरता को लेकर महत्वपूर्ण फैसले लिए जाएंगे। वहीं पुतिन ने BRICS को लेकर भी अहम टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि BRICS अब एक ऐसे संगठन के रूप में उभर रहा है जो वैश्विक दक्षिण के देशों को एकजुट कर रहा है और अमेरिका-यूरोप के दबदबे को चुनौती दे रहा है। पुतिन का मानना है कि BRICS का विस्तार न केवल आर्थिक सहयोग को बढ़ाएगा बल्कि वैश्विक राजनीतिक संतुलन को भी मजबूत करेगा।
रूस का रुख स्पष्ट है कि अब वह पश्चिमी देशों की नीतियों पर निर्भर नहीं रहना चाहता। यूक्रेन युद्ध के बाद से अमेरिका और यूरोपीय संघ ने रूस पर कई तरह के कड़े आर्थिक और तकनीकी प्रतिबंध लगाए हैं। लेकिन पुतिन का कहना है कि इन प्रतिबंधों से रूस कमजोर नहीं हुआ बल्कि उसने आत्मनिर्भरता की राह पकड़ी है। आज रूस ऊर्जा, रक्षा और कृषि के क्षेत्र में नई साझेदारियों के साथ मजबूती से खड़ा है।
SCO और BRICS जैसे मंचों को पुतिन ने भविष्य की वैश्विक राजनीति का अहम स्तंभ बताया। उनका कहना है कि ये संगठन विकासशील देशों को समान अवसर देते हैं और वैश्विक स्तर पर संतुलित व्यवस्था स्थापित करने में मदद कर रहे हैं। खासकर BRICS, जो आज विश्व की 40 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या और 30 प्रतिशत से ज्यादा जीडीपी का प्रतिनिधित्व करता है, वह अंतरराष्ट्रीय आर्थिक और राजनीतिक परिदृश्य में एक मजबूत आवाज बन चुका है।
विश्लेषकों का मानना है कि पुतिन का यह सख्त रुख न केवल अमेरिका को सीधा संदेश है बल्कि सहयोगी देशों को यह भरोसा भी दिलाता है कि रूस पश्चिमी दबाव के बावजूद अपने रुख से पीछे नहीं हटेगा। SCO बैठक में पुतिन के इन बयानों के बाद यह साफ हो गया है कि आने वाले समय में एशिया और वैश्विक दक्षिण के देश मिलकर नई विश्व व्यवस्था की दिशा तय करेंगे।



