
यूरोपियन यूनियन (European Union) जल्द ही सैनिटाइजर में एथेनॉल (Ethanol) के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने की तैयारी में है। कोविड-19 महामारी के दौरान सैनिटाइजर का उपयोग तेजी से बढ़ा था, जिसमें एथेनॉल मुख्य घटक के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन अब यूरोपियन केमिकल्स एजेंसी (ECHA) ने एथेनॉल को लेकर कुछ गंभीर स्वास्थ्य और पर्यावरणीय चिंताएं जताई हैं, जिसके चलते ईयू इसकी समीक्षा कर रहा है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, एथेनॉल में पाए जाने वाले कुछ रासायनिक तत्व लंबे समय तक इस्तेमाल करने पर त्वचा की संवेदनशीलता, सांस संबंधी समस्याएं और जलन जैसे दुष्प्रभाव पैदा कर सकते हैं। इसके अलावा, एथेनॉल के उत्पादन और इस्तेमाल से पर्यावरण पर भी असर पड़ता है क्योंकि यह हवा में वाष्पशील जैविक यौगिक (VOCs) छोड़ता है, जो प्रदूषण बढ़ाने में सहायक होते हैं।
ईयू की एजेंसी ने सुझाव दिया है कि सैनिटाइजर में एथेनॉल की जगह अन्य कम-हानिकारक और पर्यावरण-हितैषी विकल्पों का उपयोग किया जाए। इनमें आइसोप्रोपाइल अल्कोहल (Isopropyl Alcohol) और अन्य बायो-बेस्ड सॉल्यूशंस को शामिल किया जा सकता है। हालांकि, अभी अंतिम फैसला नहीं लिया गया है और इसके लिए सदस्य देशों से परामर्श प्रक्रिया जारी है।
कई उद्योग संगठनों ने इस प्रस्ताव पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि एथेनॉल लंबे समय से सैनिटाइजर का सुरक्षित घटक माना जाता रहा है और इसे विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने भी प्रभावी बताया है। अगर ईयू इस पर बैन लगाता है तो यूरोप के सैनिटाइजर निर्माताओं को उत्पादन लागत बढ़ने और नए फॉर्मूले विकसित करने में बड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा।
विशेषज्ञों का कहना है कि यूरोपियन यूनियन का उद्देश्य सीधे बैन लगाने का नहीं है, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और पर्यावरण सुरक्षा के बीच संतुलन बनाना है। यदि एथेनॉल पर बैन लगाया जाता है, तो यह फैसला वैश्विक स्तर पर भी असर डाल सकता है क्योंकि कई देश ईयू मानकों का पालन करते हैं।
कुल मिलाकर, एथेनॉल पर संभावित प्रतिबंध को लेकर बहस तेज हो गई है। जहां एक तरफ इसे स्वास्थ्य सुरक्षा की दिशा में बड़ा कदम बताया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर उद्योग जगत इसे “अतिवादी कदम” मान रहा है। आने वाले महीनों में ईयू का अंतिम निर्णय यह तय करेगा कि सैनिटाइजर उद्योग किस दिशा में आगे बढ़ेगा।



