
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत समय-समय पर देश और समाज को दिशा देने वाले संदेश देते रहते हैं। हाल ही में उन्होंने एक महत्वपूर्ण बयान दिया, जिसमें उन्होंने भारत की ऐतिहासिक भूमिका और भविष्य की जिम्मेदारियों पर जोर दिया। भागवत ने कहा कि भारत ने प्राचीन काल में विश्व का नेतृत्व किया था और आज भी हमारे पास पूरी दुनिया को दिशा दिखाने की क्षमता है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह जिम्मेदारी केवल सत्ता या ताकत से नहीं, बल्कि मूल्यों, संस्कृति और नैतिक आदर्शों के आधार पर निभाई जानी चाहिए।
मोहन भागवत ने अपने संदेश में कहा कि भारत का इतिहास केवल युद्धों और साम्राज्यों का नहीं है, बल्कि यह ज्ञान, संस्कृति, अध्यात्म और मानवता की सेवा का इतिहास है। भारत ने हमेशा ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की भावना से दुनिया को जोड़ने का प्रयास किया। योग, आयुर्वेद, दर्शन और आध्यात्मिकता जैसे उपहार भारत ने विश्व को दिए, जिनका महत्व आज भी उतना ही है। उन्होंने कहा कि जब भारत अपनी पहचान को मजबूत करेगा और आत्मनिर्भर बनेगा, तभी वह फिर से विश्व का नेतृत्व कर सकेगा।
RSS प्रमुख ने यह भी बताया कि आज के समय में दुनिया कई संकटों से जूझ रही है—चाहे वह पर्यावरणीय संकट हो, युद्ध का खतरा हो या मानवीय मूल्यों का पतन। ऐसे समय में भारत को अपने आदर्शों और मूल्यों के माध्यम से विश्व का मार्गदर्शन करना होगा। उन्होंने युवाओं को संदेश दिया कि वे तकनीकी प्रगति और आधुनिकता को अपनाएं, लेकिन अपनी जड़ों और संस्कृति से जुड़े रहें।
भागवत ने चेतावनी भी दी कि यदि भारत केवल आर्थिक और तकनीकी प्रगति पर ध्यान देगा और अपनी सांस्कृतिक विरासत को भूल जाएगा तो उसका नेतृत्व अधूरा रहेगा। उन्होंने कहा कि नेतृत्व का अर्थ दूसरों पर हावी होना नहीं है, बल्कि दूसरों को साथ लेकर चलना है। भारत को ऐसा मॉडल प्रस्तुत करना होगा जो न्याय, समानता और भाईचारे पर आधारित हो।
उन्होंने यह भी जोर दिया कि भारत के लिए आत्मनिर्भरता (आत्मनिर्भर भारत) केवल नारे तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यह एक ऐसी जीवनशैली होनी चाहिए, जिसमें स्थानीय उत्पादन, पर्यावरण की रक्षा और सामाजिक सद्भाव पर बल दिया जाए। उन्होंने समाज को आह्वान किया कि सभी नागरिक अपनी जिम्मेदारियों को समझें और केवल सरकार से अपेक्षा न रखें।
मोहन भागवत के इस संदेश का गहरा अर्थ यह है कि भारत के पास न केवल अतीत का गौरव है, बल्कि भविष्य की दिशा भी। अगर भारत अपने ज्ञान, विज्ञान और संस्कृति को सही तरीके से विश्व के सामने प्रस्तुत करे तो वह फिर से ‘विश्व गुरु’ बन सकता है। यह तभी संभव है जब हर भारतीय अपने जीवन में नैतिक मूल्यों और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखे।
निष्कर्षतः, भागवत का संदेश केवल संघ या किसी एक विचारधारा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे भारत और मानवता के लिए है। उन्होंने याद दिलाया कि भारत ने अतीत में विश्व का नेतृत्व किया था, लेकिन आज जरूरत है कि हम अपने आदर्शों और कर्तव्यों को पहचानकर फिर से उस भूमिका को निभाएं। यही वह रास्ता है जो भारत को विश्व मंच पर सम्मान और नेतृत्व दिला सकता है।



