अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का गुस्सा एक बार फिर चर्चा में है। इस बार उनका निशाना बने हैं भारतीय मूल के अमेरिकी नेता जोहरान ममदानी, जो न्यूयॉर्क विधानसभा के सदस्य हैं और प्रोग्रेसिव राजनीति के लिए जाने जाते हैं।
ट्रंप ने एक सार्वजनिक बयान में जोहरान को चेतावनी देते हुए कहा, “सुधर जाओ वरना परिणाम भुगतने को तैयार रहो।” ट्रंप के इस बयान से अमेरिका की राजनीति में हलचल मच गई है। बताया जा रहा है कि ममदानी ने एक हालिया इंटरव्यू में ट्रंप की नीतियों और उनके प्रशासन को लेकर तीखी आलोचना की थी, जिससे ट्रंप नाराज़ हो गए।
जोहरान ममदानी अमेरिका में रहने वाले प्रगतिशील भारतीय समुदाय की आवाज माने जाते हैं और फिलिस्तीन समर्थक रुख के चलते अक्सर विवादों में रहते हैं। उन्होंने इजरायल और गाज़ा संघर्ष को लेकर भी अमेरिका की विदेश नीति की आलोचना की थी।
ट्रंप की यह प्रतिक्रिया न केवल व्यक्तिगत नाराजगी दिखाती है, बल्कि 2024-25 की अमेरिकी राजनीति में फिर से कटुता और ध्रुवीकरण के संकेत भी देती है। सोशल मीडिया पर इस विवाद को लेकर बहस छिड़ गई है — कुछ लोग ट्रंप के बयानों की निंदा कर रहे हैं, तो कुछ इसे “सीधा और स्पष्ट नेतृत्व” बता रहे हैं।
जोहरान ममदानी ने हाल ही में एक सार्वजनिक मंच पर अमेरिका की विदेश नीति की कड़ी आलोचना की थी, खासकर इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष को लेकर। उन्होंने यह आरोप लगाया कि अमेरिका की नीतियां एकतरफा हैं और यह “संवेदनहीन और अन्यायपूर्ण” रवैया अपनाता है। इस बयान के तुरंत बाद, ट्रंप समर्थक वर्ग और खुद डोनाल्ड ट्रंप ने इसे राष्ट्र विरोधी करार देते हुए कड़ी प्रतिक्रिया दी।
डोनाल्ड ट्रंप ने अपने बयान में यह भी कहा कि –
“हमारी जमीन पर रहकर अगर कोई हमारे देश के खिलाफ बोलेगा, तो उसे हम बर्दाश्त नहीं करेंगे। जोहरान जैसे लोगों को सुधर जाना चाहिए, नहीं तो परिणाम भुगतने को तैयार रहें।”
ट्रंप के इस बयान के बाद अमेरिकी राजनीति में बयानबाज़ी और भी तीखी हो गई है। जहां एक ओर प्रोग्रेसिव डेमोक्रेट्स ममदानी के साथ खड़े नजर आ रहे हैं, वहीं रिपब्लिकन खेमे ने उनके इस्तीफे तक की मांग कर दी है।
जोहरान ममदानी ने ट्रंप के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा:
“सच्चाई बोलना अगर गुनाह है, तो मैं यह गुनाह करता रहूंगा। ट्रंप की धमकियों से मैं डरने वाला नहीं हूं। मैं अमेरिकी संविधान और मानवता के अधिकारों की रक्षा करता रहूंगा।”
इस पूरे मामले ने ना सिर्फ अमेरिका की आंतरिक राजनीति में भूचाल ला दिया है, बल्कि यह भारतीय डायस्पोरा और प्रवासी नेताओं की भूमिका पर भी एक नई बहस छेड़ दी है।



