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नेपाल के लिए काला दिन’ : सोशल मीडिया बैन पर मनीषा कोइराला की प्रतिक्रिया, देशभर में मचा बवाल

नेपाल में हाल ही में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर बैन लगाने का निर्णय सरकार द्वारा लिया गया, जिसने पूरे देश को हिला दिया है। इस फैसले के विरोध में राजधानी काठमांडू से लेकर ग्रामीण इलाकों तक व्यापक प्रदर्शन देखने को मिल रहे हैं। लोग इसे अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला बता रहे हैं। इसी बीच नेपाल की मशहूर बॉलीवुड अभिनेत्री और समाजसेवी मनीषा कोइराला ने भी चुप्पी तोड़ते हुए इस मामले पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने इस कदम को नेपाल के लोकतांत्रिक मूल्यों पर गहरा आघात बताया और इसे “नेपाल के लिए काला दिन” करार दिया।

मनीषा कोइराला का कहना है कि सोशल मीडिया आज सिर्फ मनोरंजन का जरिया नहीं, बल्कि आम जनता की आवाज़ है। यह एक ऐसा मंच है, जहां नागरिक अपनी राय खुलकर व्यक्त करते हैं, सरकार के कामकाज पर सवाल उठाते हैं और लोकतंत्र को मजबूत बनाने में भागीदारी करते हैं। ऐसे में इस पर अचानक बैन लगाना नागरिकों की मौलिक स्वतंत्रता छीनने जैसा है।

नेपाल सरकार ने सुरक्षा और अफवाहों पर रोक लगाने का तर्क देते हुए यह बैन लगाया है। उनका कहना है कि सोशल मीडिया के गलत इस्तेमाल से समाज में नफरत और अस्थिरता फैल रही थी। लेकिन विरोधियों का मानना है कि असल वजह सरकार के खिलाफ बढ़ते असंतोष को दबाना है। संसद परिसर के बाहर भी हजारों की संख्या में प्रदर्शनकारी इकट्ठा हुए और “फ्रीडम ऑफ स्पीच” बहाल करने की मांग की।

मनीषा कोइराला ने अपने बयान में साफ कहा कि लोकतंत्र में असहमति को दबाने से हालात सुधरते नहीं, बल्कि और बिगड़ते हैं। उन्होंने युवाओं से शांतिपूर्ण तरीके से विरोध करने और अपनी आवाज़ दुनिया तक पहुँचाने की अपील की। उनका यह बयान सोशल मीडिया (जहां VPN के जरिए लोग अब भी सक्रिय हैं) पर वायरल हो रहा है और लाखों लोग उनका समर्थन कर रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम नेपाल की अंतरराष्ट्रीय छवि को भी नुकसान पहुंचा सकता है। वैश्विक स्तर पर नेपाल को लोकतांत्रिक और खुला समाज माना जाता रहा है। ऐसे में सोशल मीडिया प्रतिबंध से विदेशी निवेशक और पर्यटक भी असहज महसूस कर सकते हैं।

कुल मिलाकर, सोशल मीडिया बैन का फैसला नेपाल की राजनीति में बड़ा मुद्दा बन गया है। एक ओर सरकार इसे जरूरी मान रही है, वहीं आम जनता और विपक्ष इसे जनता की आवाज़ दबाने की साजिश बता रहे हैं। अब देखना होगा कि भारी विरोध और अंतरराष्ट्रीय दबाव के बीच सरकार अपने फैसले पर कायम रहती है या इसे वापस लेने पर विचार करती है।

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