
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने एक इंटरव्यू में बड़ा बयान देते हुए कहा कि संघ में शामिल होने के लिए किसी व्यक्ति का धर्म या मज़हब मायने नहीं रखता, बल्कि उसकी सोच और भारत के प्रति समर्पण सबसे महत्वपूर्ण है। जब उनसे पूछा गया कि क्या मुस्लिम भी RSS का हिस्सा बन सकते हैं, तो उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा — “जो व्यक्ति खुद को भारतीय मानता है और भारत माता की सेवा के लिए समर्पित है, वह संघ का स्वयंसेवक बन सकता है। चाहे वह किसी भी धर्म का क्यों न हो।”
भागवत के इस बयान ने सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है। कई लोगों ने इसे RSS की विचारधारा में व्यापकता और समावेशिता की झलक बताया, तो वहीं कुछ आलोचकों ने इसे “छवि सुधारने का प्रयास” कहा।
संघ प्रमुख ने यह भी कहा कि RSS का उद्देश्य सत्ता प्राप्त करना नहीं बल्कि समाज का संगठन और राष्ट्र निर्माण करना है। उन्होंने कहा कि भारत की संस्कृति ‘सर्वधर्म समभाव’ की है और यहां हर धर्म का सम्मान होता है। भागवत ने कहा कि संघ की दृष्टि में “हिंदू” का अर्थ संकीर्ण धार्मिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और राष्ट्रीय पहचान से जुड़ा है — ऐसा व्यक्ति जो भारत की परंपरा, संस्कृति और मूल्य प्रणाली से जुड़ा है, वह हिंदू कहलाता है, भले ही उसका धर्म कुछ भी हो।
भागवत ने यह भी उदाहरण दिया कि अतीत में कई मुस्लिम विद्वान, कलाकार और नेता भारत की संस्कृति के वाहक रहे हैं, और आज भी अगर कोई व्यक्ति देश की अखंडता और विकास के लिए समर्पित है, तो RSS में उसके लिए दरवाजे खुले हैं।
इस बयान के बाद RSS को लेकर बनी कई पुरानी धारणाएं टूटती दिखाई दे रही हैं। मोहन भागवत के अनुसार, “भारत सभी का है, और जो भारत को अपना मानता है, वह RSS का भी है।”



