
इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का स्वभाव पहले से ही आक्रामक माना जाता है, लेकिन अमेरिका से लौटते ही उनका गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ गया है। दरअसल, ब्रिटेन, कनाडा समेत चार बड़े देशों ने ऐसा कदम उठाया है जिसने इज़राइल और नेतन्याहू की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। अमेरिका दौरे पर नेतन्याहू ने कई अहम नेताओं से मुलाकात की थी और इज़राइल की सुरक्षा एवं गाज़ा संघर्ष को लेकर अपनी रणनीति पेश की थी। लेकिन जैसे ही वह वतन लौटे, उन्हें यह कड़ा झटका मिला।
रिपोर्ट के मुताबिक, ब्रिटेन, कनाडा, फ्रांस और ऑस्ट्रेलिया ने गाज़ा पट्टी में हो रही तबाही पर कड़ा रुख अपनाते हुए इज़राइल से सैन्य कार्रवाई रोकने का आग्रह किया है। साथ ही इन देशों ने फिलिस्तीनी नागरिकों की बढ़ती मौतों और मानवीय संकट पर गहरी चिंता जताई है। यह कदम उस समय उठाया गया है जब गाज़ा में लगातार बमबारी और हिंसा से हजारों लोग मारे जा चुके हैं और लाखों विस्थापित हो गए हैं।
नेतन्याहू का मानना है कि यह बड़े पश्चिमी देशों की उनकी सरकार पर सीधी दबाव बनाने की रणनीति है। इज़राइल पहले ही हमास के खिलाफ कड़ा रुख अपनाए हुए है और नेतन्याहू कई बार साफ कह चुके हैं कि जब तक हमास पूरी तरह खत्म नहीं होता, तब तक अभियान जारी रहेगा। लेकिन अब ब्रिटेन, कनाडा और उनके साथ जुड़े देशों के रुख ने इज़राइल की विदेश नीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
सूत्रों का कहना है कि नेतन्याहू ने अपनी कैबिनेट मीटिंग में इस स्थिति को लेकर नाराज़गी जताई और कहा कि अमेरिका दौरे से लौटते ही इज़राइल को चार देशों की इस ‘कूटनीतिक जंग’ का सामना करना परेशान करने वाला है। उन्होंने साफ कहा कि “इज़राइल की सुरक्षा और अस्तित्व पर कोई समझौता नहीं किया जाएगा।”
विश्लेषकों के मुताबिक, यह घटनाक्रम पश्चिम एशिया की राजनीति में बड़े बदलाव का संकेत है। जहां पहले ज्यादातर पश्चिमी देश इज़राइल का समर्थन बिना शर्त करते थे, अब वहां मानवाधिकार और मानवीय संकट के मुद्दे को नजरअंदाज करना कठिन हो गया है। कनाडा और ब्रिटेन जैसे पारंपरिक सहयोगी देशों का इज़राइल की नीतियों की आलोचना करना बताता है कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर नेतन्याहू की राह आसान नहीं रहने वाली।
कूटनीतिक सूत्रों का मानना है कि अगर इज़राइल अपनी रणनीति में बदलाव नहीं करता, तो आने वाले महीनों में उसे वैश्विक स्तर पर और ज्यादा दबाव का सामना करना पड़ेगा। वहीं, फिलिस्तीन समर्थक देश इस घटनाक्रम को अपनी जीत के रूप में देख रहे हैं। उनका कहना है कि अब वक्त आ गया है जब इज़राइल को अपने सैन्य रवैये पर पुनर्विचार करना होगा।
कुल मिलाकर, अमेरिका दौरे से लौटने के बाद नेतन्याहू के लिए हालात बिल्कुल आसान नहीं हैं। ब्रिटेन, कनाडा, फ्रांस और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों की नाराज़गी अब उनके लिए नए संकट की शुरुआत हो सकती है। यह देखना दिलचस्प होगा कि नेतन्याहू अंतरराष्ट्रीय दबाव के आगे झुकते हैं या अपनी परंपरागत कट्टर नीति पर डटे रहते हैं।



