यूपी में स्वास्थ्य सेवाओं पर बजट खर्च की हकीकत: 56% राशि क्यों रह गई अप्रयुक्त?

उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के लिए हर वर्ष बड़े पैमाने पर बजट आवंटित किया जाता है, लेकिन हालिया रिपोर्टों के अनुसार आवंटित बजट का लगभग 56 प्रतिशत हिस्सा खर्च नहीं हो पाया। यह स्थिति राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने गंभीर सवाल खड़े करती है, क्योंकि एक ओर ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में अस्पतालों की कमी, डॉक्टरों व नर्सिंग स्टाफ की कमी, दवाओं और आधुनिक उपकरणों का अभाव दिखाई देता है, वहीं दूसरी ओर करोड़ों रुपये बिना उपयोग के ही रह जाते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि बजट खर्च न हो पाने के पीछे प्रशासनिक जटिलताएं, योजनाओं के क्रियान्वयन में देरी, टेंडर प्रक्रिया में अड़चनें और केंद्र व राज्य स्तर के बीच समन्वय की कमी प्रमुख कारण हैं। कई बार योजनाएं समय पर स्वीकृत तो हो जाती हैं, लेकिन जमीन पर उनके क्रियान्वयन की रफ्तार इतनी धीमी होती है कि वित्तीय वर्ष समाप्त हो जाता है और राशि लैप्स हो जाती है। इसका सीधा असर आम जनता पर पड़ता है, खासकर गरीब और ग्रामीण आबादी पर, जो सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं पर सबसे अधिक निर्भर होती है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में संसाधनों की कमी, जिला अस्पतालों में बेड और विशेषज्ञ डॉक्टरों का अभाव तथा मेडिकल कॉलेजों में अधूरी परियोजनाएं इसी समस्या का परिणाम मानी जाती हैं। स्वास्थ्य बजट का सही और समयबद्ध उपयोग न होने से मातृ एवं शिशु मृत्यु दर, संक्रामक रोगों की रोकथाम और आपातकालीन सेवाओं के विस्तार जैसे अहम लक्ष्य प्रभावित होते हैं। हालांकि राज्य सरकार समय-समय पर स्वास्थ्य ढांचे को सुदृढ़ करने के दावे करती रही है और कई नई योजनाएं भी शुरू की गई हैं, लेकिन बजट उपयोग की यह स्थिति इन दावों की प्रभावशीलता पर सवाल उठाती है। नीति विशेषज्ञों का सुझाव है कि बजट प्लानिंग को जमीनी जरूरतों से जोड़ना, परियोजनाओं की निगरानी को मजबूत करना, स्थानीय स्तर पर निर्णय लेने की क्षमता बढ़ाना और जवाबदेही तय करना बेहद जरूरी है। यदि आवंटित धन का सही दिशा में और पारदर्शी तरीके से उपयोग किया जाए, तो प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं में बड़ा सुधार संभव है और आम नागरिकों को बेहतर, सुलभ और गुणवत्तापूर्ण इलाज मिल सकता है।



