
चीन ने अक्टूबर 2025 से विशेष उर्वरकों के निर्यात पर एक बार फिर प्रतिबंध लगाने की घोषणा कर दी है। यह कदम न केवल वैश्विक कृषि क्षेत्र को प्रभावित करेगा बल्कि भारत जैसे बड़े कृषि प्रधान देशों की अर्थव्यवस्था पर भी सीधा असर डाल सकता है। चीन दुनिया का सबसे बड़ा उर्वरक उत्पादक और निर्यातक देशों में से एक है, और उसकी नीतियों में बदलाव का सीधा असर वैश्विक बाजार पर पड़ता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, चीन ने यह निर्णय घरेलू मांग को प्राथमिकता देने और अपनी आंतरिक खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए लिया है। चीन में हर साल धान, गेहूं और मक्का जैसी फसलों की बुआई बड़े पैमाने पर होती है, जिसके लिए भारी मात्रा में उर्वरकों की जरूरत पड़ती है। अगर निर्यात जारी रहता, तो घरेलू बाजार में कमी और कीमतों में उछाल की आशंका रहती। इसी वजह से चीन ने वैश्विक आपूर्ति पर रोक लगाने का फैसला लिया है।
भारत इस प्रतिबंध से सबसे अधिक प्रभावित देशों में से एक होगा। भारत अपनी खाद आवश्यकताओं का एक बड़ा हिस्सा चीन से आयात करता है, खासकर डाई-एमोनियम फॉस्फेट (DAP) और नाइट्रोजन-आधारित विशेष उर्वरकों का। जब निर्यात पर रोक लगेगी तो भारतीय किसानों को महंगे दामों पर उर्वरक खरीदने पड़ सकते हैं। इससे खरीफ और रबी दोनों सीजन की फसलों की लागत बढ़ जाएगी। परिणामस्वरूप खाद्य पदार्थों की कीमतों पर भी दबाव बढ़ सकता है।
इसके अलावा, पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश और कई अफ्रीकी देश भी चीन पर उर्वरकों के लिए निर्भर हैं। प्रतिबंध के कारण इन देशों को वैकल्पिक स्रोत तलाशने होंगे। रूस, मोरक्को और सऊदी अरब जैसे देशों से आयात बढ़ाया जा सकता है, लेकिन वहां भी कीमतें पहले से ही ऊंची हैं। ऐसे में लागत और बढ़ने की आशंका है।
भारत सरकार इस स्थिति से निपटने के लिए वैकल्पिक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर काम कर रही है। हाल ही में सरकार ने घरेलू उर्वरक उत्पादन क्षमता को बढ़ाने पर जोर दिया है। “आत्मनिर्भर भारत” योजना के तहत कई नए प्लांट स्थापित किए जा रहे हैं, लेकिन अभी भी भारत को आयात पर निर्भर रहना पड़ता है।
अगर यह प्रतिबंध लंबे समय तक जारी रहा, तो वैश्विक स्तर पर खाद्य संकट गहरा सकता है। बढ़ी हुई लागत का असर सीधा किसानों की आय और आम जनता की रसोई तक पहुंचेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को मिलकर उर्वरकों की स्थिर आपूर्ति सुनिश्चित करनी होगी, वरना कृषि उत्पादन में गिरावट और महंगाई दोनों का खतरा बढ़ सकता है।
संक्षेप में, चीन का यह फैसला केवल उसके घरेलू बाजार तक सीमित नहीं है बल्कि पूरी दुनिया के कृषि तंत्र को प्रभावित करेगा। आने वाले महीनों में उर्वरक की कीमतों और आपूर्ति की दिशा तय करेगी कि किसान और उपभोक्ता कितनी चुनौती का सामना करेंगे।



