
भारत में ऊर्जा क्षेत्र से जुड़ी नीतियों पर लगातार बहस होती रही है। सरकार द्वारा एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (Ethanol Blended Petrol) के उपयोग को बढ़ावा दिया जा रहा है, ताकि देश की विदेशी तेल पर निर्भरता कम हो और किसानों को अतिरिक्त आमदनी मिल सके। लेकिन इसी बीच एथेनॉल युक्त पेट्रोल के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट (SC) में एक याचिका दायर की गई है, जिस पर आज सुनवाई हो सकती है। याचिकाकर्ता का कहना है कि एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल से पर्यावरण और वाहनों दोनों को नुकसान हो रहा है, इसलिए इसकी नीति की समीक्षा जरूरी है।
याचिका में प्रमुख रूप से यह मांग की गई है कि सरकार एथेनॉल पेट्रोल की अनिवार्यता पर पुनर्विचार करे। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि एथेनॉल की अधिक मात्रा से वाहनों के इंजन को नुकसान पहुंच सकता है। पुराने मॉडल की गाड़ियों में यह ईंधन सही तरीके से काम नहीं करता और इससे सड़क सुरक्षा को भी खतरा हो सकता है। साथ ही, एथेनॉल उत्पादन के लिए गन्ने और मक्का जैसी फसलों का अत्यधिक उपयोग होता है, जिससे खाद्यान्न सुरक्षा पर भी असर पड़ सकता है।
पेट्रोलियम मंत्रालय और सरकार का पक्ष यह है कि एथेनॉल मिश्रण से कार्बन उत्सर्जन कम होता है और यह ग्रीन एनर्जी की दिशा में एक अहम कदम है। सरकार का लक्ष्य 2025 तक पेट्रोल में 20% एथेनॉल मिश्रण का है, जिससे प्रदूषण में कमी आएगी और किसानों को लाभ मिलेगा। लेकिन आलोचकों का कहना है कि यह कदम दीर्घकालिक रूप से स्थायी नहीं है, क्योंकि एथेनॉल उत्पादन में भारी मात्रा में पानी और कृषि भूमि का उपयोग होता है।
याचिका में यह भी मांग की गई है कि सरकार पर्यावरण हित में यदि विकल्प तलाशना चाहती है, तो इलेक्ट्रिक वाहन और ग्रीन हाइड्रोजन जैसे विकल्पों को प्राथमिकता दे। इससे न केवल प्रदूषण कम होगा बल्कि भविष्य के लिए एक टिकाऊ समाधान भी मिलेगा। अदालत में इस मुद्दे पर सुनवाई से यह साफ होगा कि क्या सरकार की नीति में कोई बदलाव होगा या फिर एथेनॉल मिश्रण को और मजबूती मिलेगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला इस मामले में महत्वपूर्ण होगा, क्योंकि यह केवल ईंधन नीति का नहीं बल्कि कृषि, पर्यावरण और ऑटोमोबाइल सेक्टर से जुड़ा हुआ विषय है। यदि कोर्ट सरकार से जवाब मांगेगा, तो एथेनॉल मिश्रण की पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता और प्रभावशीलता पर भी सवाल उठ सकते हैं।
कुल मिलाकर, एथेनॉल युक्त पेट्रोल पर यह सुनवाई देश की ऊर्जा रणनीति और पर्यावरण नीति के भविष्य की दिशा तय कर सकती है। अब सबकी निगाहें सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिकी हैं।



