Burnout नहीं, Boreout बना नई चुनौती! अच्छी सैलरी के बावजूद क्यों बढ़ रहा है डिप्रेशन?

लंबे समय तक अत्यधिक काम के दबाव से होने वाले ‘बर्नआउट’ के बारे में तो अक्सर चर्चा होती है, लेकिन अब ‘बोरआउट’ नाम की एक नई समस्या तेजी से ध्यान खींच रही है। बोरआउट उस स्थिति को कहा जाता है, जब कर्मचारी अपनी नौकरी में चुनौती, उद्देश्य या सीखने के अवसरों की कमी महसूस करने लगते हैं। बाहर से सब कुछ ठीक दिखने के बावजूद अंदर ही अंदर वे निराशा, ऊब और मानसिक थकान का अनुभव करते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, बोरआउट का संबंध केवल काम की मात्रा से नहीं, बल्कि काम की गुणवत्ता और अर्थपूर्णता से भी है। कई बार कर्मचारियों को उनकी क्षमता से बहुत कम जिम्मेदारियां दी जाती हैं या उन्हें ऐसा काम करना पड़ता है, जिसमें न तो रचनात्मकता की गुंजाइश होती है और न ही विकास की। ऐसी स्थिति में व्यक्ति धीरे-धीरे अपनी नौकरी से भावनात्मक रूप से कटने लगता है।
दिलचस्प बात यह है कि बोरआउट का शिकार होने वाले कई लोगों को अच्छी सैलरी, सुविधाएं और सुरक्षित नौकरी भी मिली होती है। इसके बावजूद वे संतुष्टि महसूस नहीं कर पाते। मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि इंसान को केवल आर्थिक सुरक्षा ही नहीं, बल्कि उद्देश्य, उपलब्धि और व्यक्तिगत विकास की भावना भी चाहिए होती है। जब ये चीजें नहीं मिलतीं, तो तनाव, चिंता और अवसाद जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं।
विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि कर्मचारियों को अपनी भूमिका में नए कौशल सीखने, अतिरिक्त जिम्मेदारियां लेने और करियर लक्ष्यों पर काम करने के अवसर तलाशने चाहिए। वहीं कंपनियों को भी कर्मचारियों की भागीदारी बढ़ाने, कौशल विकास के अवसर देने और सार्थक कार्य वातावरण तैयार करने पर ध्यान देना चाहिए। बोरआउट को समय रहते पहचानना और उसका समाधान करना स्वस्थ एवं उत्पादक कार्य संस्कृति के लिए बेहद जरूरी माना जा रहा है।



