‘Design in India’ से ग्लोबल डिफेंस हब बनेगा यूपी

उत्तर प्रदेश अब ‘Make in India’ से एक कदम आगे बढ़कर ‘Design in India’ की दिशा में बड़ा कदम उठाने की तैयारी कर रहा है। राज्य सरकार का लक्ष्य उत्तर प्रदेश को सिर्फ रक्षा उपकरण बनाने वाला प्रदेश नहीं, बल्कि नई रक्षा तकनीकों के डिजाइन, रिसर्च, विकास और उत्पादन का ग्लोबल सेंटर बनाना है।
इस महत्वाकांक्षी योजना में IIT कानपुर और काशी हिंदू विश्वविद्यालय यानी BHU जैसे प्रमुख तकनीकी एवं शैक्षणिक संस्थानों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। इन संस्थानों में मौजूद रिसर्च क्षमता, इंजीनियरिंग विशेषज्ञता और तकनीकी प्रतिभा को रक्षा क्षेत्र की जरूरतों से जोड़ने पर जोर दिया जा रहा है।
दरअसल, दुनिया के रक्षा उद्योग में अब केवल हथियारों का उत्पादन पर्याप्त नहीं माना जाता। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ड्रोन, रोबोटिक्स, साइबर सिक्योरिटी, सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर और स्वायत्त प्रणालियां आधुनिक सैन्य शक्ति का अहम हिस्सा बन चुकी हैं। ऐसे में जिस राज्य के पास डिजाइन और रिसर्च की क्षमता होगी, वह रक्षा आपूर्ति श्रृंखला में ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
यही सोच ‘Design in India’ के पीछे दिखाई देती है। इसका मतलब है कि विदेशी तकनीक को भारत में असेंबल करने के बजाय ऐसी तकनीकें देश में ही विकसित की जाएं, जिनका डिजाइन, परीक्षण और बौद्धिक संपदा भारत के पास हो। इससे रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को नई दिशा मिल सकती है।
उत्तर प्रदेश के लिए यह रणनीति इसलिए खास है क्योंकि राज्य पहले से ही रक्षा उत्पादन के लिए आधार तैयार कर रहा है। उत्तर प्रदेश डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर के जरिए रक्षा कंपनियों और विनिर्माण इकाइयों को आकर्षित करने की कोशिश की गई है। अब सरकार इसी औद्योगिक आधार को रिसर्च और डिजाइन क्षमता से जोड़ना चाहती है।
कानपुर इस पूरी रणनीति में महत्वपूर्ण केंद्र बनकर उभर सकता है। IIT कानपुर की मौजूदगी इसे उच्च तकनीक आधारित रक्षा अनुसंधान के लिए स्वाभाविक स्थान देती है। संस्थान में एयरोस्पेस, रोबोटिक्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मैटेरियल साइंस और इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों में विशेषज्ञता है।
अगर अकादमिक संस्थानों और रक्षा उद्योग के बीच प्रभावी सहयोग तैयार होता है, तो प्रयोगशालाओं में विकसित तकनीक को वास्तविक सैन्य जरूरतों के अनुरूप उत्पाद में बदलने की प्रक्रिया तेज हो सकती है। इससे स्टार्टअप, MSME और बड़ी रक्षा कंपनियों के लिए भी नए अवसर पैदा होंगे।
BHU की भूमिका भी इसी व्यापक इकोसिस्टम में महत्वपूर्ण हो सकती है। विश्वविद्यालय की इंजीनियरिंग, विज्ञान और चिकित्सा से जुड़ी विशेषज्ञता रक्षा क्षेत्र की अलग-अलग जरूरतों में काम आ सकती है। भविष्य में रक्षा अनुसंधान को केवल हथियारों तक सीमित रखने के बजाय मानव प्रदर्शन, मेडिकल टेक्नोलॉजी और सामग्री विज्ञान जैसे क्षेत्रों से भी जोड़ा जा सकता है।
इस मॉडल का सबसे बड़ा फायदा यह हो सकता है कि उत्तर प्रदेश में ‘Research to Manufacturing’ की पूरी श्रृंखला विकसित हो। यानी किसी तकनीक की कल्पना और रिसर्च से लेकर प्रोटोटाइप, टेस्टिंग, प्रमाणन और बड़े पैमाने पर उत्पादन तक का काम एक ही इकोसिस्टम में किया जा सके।
इससे स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के अवसर भी बढ़ सकते हैं। रक्षा उद्योग में इंजीनियरों, वैज्ञानिकों, डिजाइनरों, सॉफ्टवेयर विशेषज्ञों, डेटा साइंटिस्ट और कुशल तकनीकी कर्मचारियों की मांग बढ़ रही है। अगर राज्य में कंपनियों और रिसर्च संस्थानों का नेटवर्क मजबूत होता है तो प्रतिभाशाली युवाओं को दूसरे राज्यों या विदेशों की ओर जाने के बजाय स्थानीय स्तर पर अवसर मिल सकते हैं।
डिफेंस स्टार्टअप इस बदलाव के प्रमुख लाभार्थियों में शामिल हो सकते हैं। छोटी कंपनियां बड़े रक्षा प्लेटफॉर्म बनाने के बजाय ड्रोन, सेंसर, संचार प्रणाली, एआई सॉफ्टवेयर, निगरानी उपकरण और दूसरे महत्वपूर्ण सब-सिस्टम विकसित कर सकती हैं। IIT जैसे संस्थानों से तकनीकी सहयोग मिलने पर ऐसे स्टार्टअप के लिए प्रोटोटाइप तैयार करना और बाजार तक पहुंचना आसान हो सकता है।
उत्तर प्रदेश सरकार के लिए चुनौती सिर्फ निवेश आकर्षित करना नहीं, बल्कि ऐसा पूरा औद्योगिक वातावरण तैयार करना है जिसमें कंपनियां लंबे समय तक काम कर सकें। इसके लिए जमीन, बिजली, लॉजिस्टिक्स और कुशल मानव संसाधन के साथ-साथ टेस्टिंग सुविधाएं, प्रमाणन केंद्र और तकनीकी अनुसंधान ढांचा भी जरूरी होगा।
रक्षा क्षेत्र में एक और अहम मुद्दा विश्वसनीय सप्लाई चेन का है। किसी बड़े सैन्य प्लेटफॉर्म में हजारों छोटे-बड़े कंपोनेंट इस्तेमाल होते हैं। अगर इनका निर्माण स्थानीय MSME और स्टार्टअप कर सकें तो विदेशी सप्लाई पर निर्भरता घट सकती है और स्थानीय उद्योग को लगातार ऑर्डर मिल सकते हैं।
‘Design in India’ का लक्ष्य हासिल करने के लिए बौद्धिक संपदा भी बेहद महत्वपूर्ण होगी। यदि भारतीय संस्थान और कंपनियां नई तकनीक विकसित करती हैं और उसके पेटेंट तथा डिजाइन अधिकार भारत के पास रहते हैं, तो भविष्य में सिर्फ घरेलू जरूरतों के लिए ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार के लिए भी उत्पाद विकसित किए जा सकते हैं।
यही वह बिंदु है जहां उत्तर प्रदेश का रक्षा हब बनने का लक्ष्य ग्लोबल डिफेंस हब बनने की दिशा में बदल सकता है। घरेलू उत्पादन से आगे बढ़कर अगर राज्य रक्षा तकनीक का निर्यात करने वाली कंपनियों का केंद्र बनता है, तो इसका असर राज्य की अर्थव्यवस्था, औद्योगिक निवेश और तकनीकी प्रतिष्ठा पर भी पड़ सकता है।
हालांकि इस लक्ष्य को हासिल करना आसान नहीं होगा। रक्षा क्षेत्र में उत्पादों को विकसित करने में लंबा समय लगता है और सेना की जरूरतों के अनुरूप परीक्षण तथा प्रमाणन की प्रक्रिया भी जटिल होती है। इसके अलावा अनुसंधान संस्थानों, सरकारी एजेंसियों और निजी कंपनियों के बीच बेहतर समन्वय जरूरी होगा।
इसके बावजूद IIT कानपुर और BHU जैसे संस्थानों को औद्योगिक इकोसिस्टम से जोड़ने की कोशिश उत्तर प्रदेश के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो सकती है। इससे राज्य की पहचान पारंपरिक विनिर्माण केंद्र से आगे बढ़कर उच्च तकनीक और रक्षा अनुसंधान के केंद्र के रूप में विकसित हो सकती है।
कुल मिलाकर, उत्तर प्रदेश की नई रक्षा रणनीति का फोकस सिर्फ ‘बनाने’ पर नहीं, बल्कि ‘सोचने और डिजाइन करने’ पर भी है। IIT कानपुर और BHU जैसे संस्थानों की तकनीकी क्षमता को उद्योग से जोड़कर अगर रिसर्च, प्रोटोटाइप और उत्पादन की मजबूत श्रृंखला तैयार होती है, तो उत्तर प्रदेश भारत के रक्षा आत्मनिर्भरता अभियान का बड़ा केंद्र बन सकता है। असली सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि यह पहल कितनी तेजी से प्रयोगशालाओं की तकनीक को वास्तविक रक्षा उत्पादों और वैश्विक बाजार तक पहुंचा पाती है।



