देवीधुरा बग्वाल मेला: आठ मिनट चला रोमांचक युद्ध, जमकर बरसे फल-फूल

उत्तराखंड के चंपावत जिले में स्थित देवीधुरा के मां वाराही धाम में ऐतिहासिक बग्वाल मेले का आयोजन पूरे उत्साह और धार्मिक आस्था के साथ किया गया। रक्षाबंधन के अवसर पर आयोजित इस पारंपरिक मेले में चार खामों के रणबांकुरों ने बग्वाल की परंपरा निभाई। करीब आठ मिनट तक चले इस रोमांचक आयोजन को देखने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु और दर्शक मौजूद रहे।
बग्वाल उत्तराखंड की प्राचीन लोक परंपराओं में शामिल है। देवीधुरा में इसे मां वाराही की आराधना से जोड़कर देखा जाता है। इस दौरान विभिन्न खामों के प्रतिभागी निर्धारित स्थान पर एकत्र होकर पारंपरिक तरीके से बग्वाल खेलते हैं। यह आयोजन स्थानीय संस्कृति, धार्मिक आस्था और सामुदायिक परंपराओं का अनूठा संगम माना जाता है।
मेले में चार खामों के रणबांकुरे पूरे जोश के साथ मैदान में उतरे। पारंपरिक वेशभूषा और उत्साह के बीच बग्वाल शुरू हुई तो पूरा क्षेत्र जयकारों से गूंज उठा। प्रतिभागियों ने एक-दूसरे की ओर फल और फूल फेंककर सदियों पुरानी परंपरा को निभाया।
बग्वाल के दौरान मैदान में उत्साह का माहौल बना रहा। दर्शक भी इस ऐतिहासिक परंपरा को देखने के लिए उत्सुक नजर आए। करीब आठ मिनट तक चले इस आयोजन के दौरान रणबांकुरों ने पूरी ऊर्जा के साथ भाग लिया।
देवीधुरा की बग्वाल को केवल एक मेले के रूप में नहीं देखा जाता, बल्कि यह स्थानीय लोगों की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान से गहराई से जुड़ी हुई है। मां वाराही धाम में हर वर्ष रक्षाबंधन के अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं और बग्वाल के साक्षी बनते हैं।
मेले के दौरान मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्रों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ देखने को मिली। लोगों ने मां वाराही की पूजा-अर्चना की और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की। धार्मिक अनुष्ठानों के साथ बग्वाल आयोजन ने पूरे क्षेत्र में उत्सव का माहौल बना दिया।
बग्वाल से जुड़ी परंपरा को पीढ़ियों से स्थानीय समुदाय आगे बढ़ाता आ रहा है। इसमें चार खामों के लोगों की विशेष भूमिका रहती है। आयोजन के लिए प्रतिभागियों की तैयारी पहले से शुरू हो जाती है और तय नियमों के अनुसार ही बग्वाल खेली जाती है।
समय के साथ बग्वाल के स्वरूप में बदलाव भी देखने को मिला है। पहले इसमें पत्थरों का इस्तेमाल अधिक होता था, जिससे गंभीर चोटें भी लगती थीं। अब आयोजन को सुरक्षित बनाने के लिए फल और फूलों का इस्तेमाल किया जाता है। इससे परंपरा भी कायम रहती है और प्रतिभागियों की सुरक्षा पर भी ध्यान दिया जाता है।
देवीधुरा बग्वाल मेले में प्रशासन की ओर से भी सुरक्षा और यातायात व्यवस्था पर विशेष ध्यान दिया गया। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने को देखते हुए पुलिस और प्रशासन की टीमों को तैनात किया गया।
आठ मिनट तक चले बग्वाल के दौरान रणबांकुरों का उत्साह देखते ही बनता था। फल और फूलों के बीच पारंपरिक युद्ध का यह दृश्य श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र रहा। आयोजन समाप्त होने के बाद भी मेले में धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियां जारी रहीं।
देवीधुरा की बग्वाल आज भी उत्तराखंड की समृद्ध लोक संस्कृति और धार्मिक परंपराओं को जीवंत बनाए हुए है। हर वर्ष हजारों श्रद्धालु इस अनूठे आयोजन को देखने पहुंचते हैं और मां वाराही के दर्शन के साथ इस ऐतिहासिक परंपरा का हिस्सा बनते हैं।



