विश्व संगीत दिवस: फोक से फ्यूजन तक बदली धुन, लेकिन पहाड़ की खुशबू वही

विश्व संगीत दिवस के अवसर पर उत्तराखंड के लोक संगीत की समृद्ध परंपरा और उसके आधुनिक स्वरूप की चर्चा एक बार फिर केंद्र में है। समय के साथ संगीत की धुनें बदली हैं, तकनीक और प्रस्तुति के नए तरीके आए हैं, लेकिन पहाड़ की मिट्टी की खुशबू और लोक संस्कृति की आत्मा आज भी इन गीतों में जीवित है।
उत्तराखंड का लोक संगीत सदियों से यहां की जीवनशैली, प्रकृति, परंपराओं और सामाजिक भावनाओं का प्रतिबिंब रहा है। झोड़ा, छपेली, चांचरी और जागर जैसे पारंपरिक संगीत रूप आज भी लोगों के बीच लोकप्रिय हैं। हालांकि नई पीढ़ी के कलाकार इन्हें आधुनिक संगीत शैली और फ्यूजन के साथ प्रस्तुत कर रहे हैं।
फोक और फ्यूजन के इस मेल ने पहाड़ी संगीत को नई पहचान दी है। युवा कलाकार पारंपरिक धुनों को गिटार, कीबोर्ड और आधुनिक वाद्ययंत्रों के साथ जोड़कर नए प्रयोग कर रहे हैं, जिससे यह संगीत देश और दुनिया के व्यापक श्रोताओं तक पहुंच रहा है।
संगीत विशेषज्ञों का मानना है कि परंपरा और आधुनिकता का संतुलन बनाए रखना सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिए आवश्यक है। यदि लोक संगीत को नए रूप में प्रस्तुत किया जाए, तो युवा पीढ़ी उससे अधिक जुड़ाव महसूस करती है और उसकी लोकप्रियता बढ़ती है।
डिजिटल प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया ने भी पहाड़ी संगीत को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। कई लोक कलाकार अब वैश्विक मंच पर अपनी पहचान बना रहे हैं और उत्तराखंड की संस्कृति को दुनिया तक पहुंचा रहे हैं।
कलाकारों का कहना है कि संगीत केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान और भावनात्मक जुड़ाव का भी प्रतीक है। इसलिए नए प्रयोगों के बावजूद लोक संगीत की मूल भावना और परंपरा को संरक्षित रखना आवश्यक है।
विश्व संगीत दिवस पर उत्तराखंड का लोक संगीत यह संदेश देता है कि समय के साथ धुनें बदल सकती हैं, लेकिन संस्कृति की जड़ें और पहाड़ की आत्मा हमेशा जीवित रहती हैं।



