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महाराष्ट्र में भूपति का समर्पण: माओवाद की विचारधारा ढही, छत्तीसगढ़ में 78 नक्सलियों ने किया आत्मसमर्पण

महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ के जंगलों में दशकों से चली आ रही माओवादी हिंसा अब अपने अंतिम दौर में दिख रही है। हाल ही में महाराष्ट्र के कुख्यात नक्सली कमांडर भूपति ने राज्य सरकार और सुरक्षा एजेंसियों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। भूपति के समर्पण को नक्सल विरोधी अभियान की एक बड़ी सफलता माना जा रहा है, क्योंकि वह लंबे समय से माओवादी संगठन की रणनीति और फंडिंग से जुड़ा प्रमुख चेहरा था। बताया जा रहा है कि भूपति के आत्मसमर्पण के साथ ही माओवादी नेटवर्क की एक अहम कड़ी टूट गई है।

इसी क्रम में, छत्तीसगढ़ में भी सुरक्षा बलों के लगातार दबाव और सरकार की पुनर्वास नीतियों के चलते 78 नक्सलियों ने हथियार डाल दिए। इन नक्सलियों में कई ऐसे थे जिन पर पुलिस को लंबे समय से इनाम घोषित था। अधिकारियों का कहना है कि नक्सलियों ने आत्मसमर्पण के बाद समाज की मुख्यधारा में लौटने की इच्छा जताई है। सरकार ने भी उन्हें पुनर्वास योजना के तहत आवश्यक सहायता देने का आश्वासन दिया है।

भूपति और अन्य नक्सलियों का समर्पण इस बात का संकेत है कि माओवादी विचारधारा अब युवाओं के बीच अपनी पकड़ खोती जा रही है। पहले जहां नक्सली ‘जनयुद्ध’ के नाम पर युवाओं को भड़काते थे, वहीं अब विकास की रोशनी, शिक्षा और रोजगार के अवसरों ने इन इलाकों में नई सोच को जन्म दिया है। पुलिस और प्रशासन द्वारा लगातार किए जा रहे विकास कार्यों और संवाद की नीति ने नक्सल प्रभावित इलाकों में विश्वास बहाली का काम किया है।

सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह रुझान जारी रहा तो आने वाले कुछ वर्षों में देश पूरी तरह नक्सलमुक्त हो सकता है। महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ दोनों राज्यों में सरकारें इस सफलता को स्थायी बनाने के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे पर विशेष ध्यान दे रही हैं। भूपति जैसे बड़े माओवादी नेताओं का समर्पण केवल एक व्यक्ति की हार नहीं, बल्कि एक विकृत विचारधारा की पराजय का प्रतीक है। यह कदम भारत में शांति, विकास और समरसता की दिशा में एक बड़ी जीत के रूप में देखा जा रहा है।

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