
देशभर में राष्ट्रभावना को मजबूत करने के उद्देश्य से एक अहम निर्णय लिया गया है, जिसके तहत अब ‘जन गण मन’ से पहले ‘वंदे मातरम’ का गायन सुनिश्चित किया जाएगा। खासतौर पर स्कूलों और शिक्षण संस्थानों में राष्ट्रगीत के सभी छह पैरा को अनिवार्य रूप से गाने पर जोर दिया गया है। यह कदम नई पीढ़ी को देश के इतिहास, स्वतंत्रता आंदोलन और राष्ट्रीय अस्मिता से जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। ‘वंदे मातरम’ केवल एक गीत नहीं, बल्कि आजादी की लड़ाई के दौरान करोड़ों भारतीयों के लिए प्रेरणा का स्रोत रहा है। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित इस गीत ने स्वतंत्रता सेनानियों में अदम्य साहस भरा और मातृभूमि के प्रति समर्पण की भावना को प्रबल किया।
निर्णय के अनुसार, स्कूलों में प्रार्थना सभा या विशेष कार्यक्रमों के दौरान पूरे सम्मान और निर्धारित स्वरूप में राष्ट्रगीत का गायन कराया जाएगा। इसके लिए शिक्षा विभाग की ओर से आवश्यक दिशा-निर्देश जारी किए जा सकते हैं, ताकि सभी जगह एकरूपता बनी रहे। शिक्षकों को भी इसके ऐतिहासिक महत्व और भावार्थ को विद्यार्थियों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी दी जाएगी, जिससे बच्चे सिर्फ शब्द ही नहीं, बल्कि उसके पीछे की भावना को भी समझ सकें।
हालांकि, इस व्यवस्था में सिनेमाघरों को छूट दी गई है। वहां इसे अनिवार्य नहीं किया गया है, बल्कि स्वैच्छिक रूप से बजाने या न बजाने का विकल्प रखा गया है। माना जा रहा है कि सार्वजनिक स्थानों पर व्यवस्थागत चुनौतियों और अलग-अलग प्रकार के दर्शकों को ध्यान में रखते हुए यह लचीलापन दिया गया है।
इस फैसले पर विभिन्न वर्गों से अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ सकती हैं, लेकिन समर्थकों का कहना है कि इससे युवाओं में राष्ट्रप्रेम की भावना और मजबूत होगी। वहीं, शिक्षा जगत के कई विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर राष्ट्रगीत के साथ उसके इतिहास और मूल संदेश को भी पढ़ाया जाए, तो इसका प्रभाव और गहरा होगा। कुल मिलाकर, यह निर्णय राष्ट्रीय पहचान और सांस्कृतिक विरासत को सहेजने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में देखा जा रहा है।



