
लोकसभा में स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव या हटाने का प्रस्ताव एक संवैधानिक प्रक्रिया के तहत लाया जाता है। वर्तमान में लोकसभा के स्पीकर Om Birla के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव की चर्चा होने पर यह सवाल उठता है कि आखिर किसी स्पीकर को पद से हटाने के लिए कितने सांसदों के वोट की जरूरत होती है। भारत के संविधान के अनुसार, लोकसभा स्पीकर को हटाने के लिए सदन में एक प्रस्ताव लाया जा सकता है, लेकिन इसके लिए पहले कम से कम 14 दिन पहले नोटिस देना अनिवार्य होता है। यह नोटिस लोकसभा सचिवालय को दिया जाता है, जिसके बाद इसे सदन की कार्यसूची में शामिल किया जाता है।
जब यह प्रस्ताव सदन में पेश होता है तो उस पर चर्चा कराई जाती है और फिर मतदान होता है। स्पीकर को हटाने के लिए साधारण बहुमत नहीं बल्कि सदन के उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का बहुमत जरूरी होता है। उदाहरण के तौर पर यदि 500 सांसद सदन में मौजूद हैं और मतदान करते हैं, तो प्रस्ताव पास होने के लिए कम से कम 251 सांसदों का समर्थन चाहिए होगा। खास बात यह है कि जिस दिन स्पीकर को हटाने का प्रस्ताव चर्चा के लिए आता है, उस दिन स्पीकर खुद सदन की अध्यक्षता नहीं करते। उस समय सदन की कार्यवाही किसी अन्य सदस्य या डिप्टी स्पीकर के जरिए संचालित की जाती है।
भारतीय संसदीय परंपरा में स्पीकर का पद बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि वह सदन की कार्यवाही को निष्पक्ष तरीके से चलाने के लिए जिम्मेदार होता है। लोकसभा में यह पद पूरे सदन का प्रतिनिधित्व करता है और स्पीकर से उम्मीद की जाती है कि वह किसी राजनीतिक पक्ष से ऊपर उठकर निर्णय लें। इसलिए किसी भी स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाना राजनीतिक रूप से बड़ा कदम माना जाता है और इसके लिए विपक्ष को पर्याप्त संख्या में सांसदों का समर्थन जुटाना पड़ता है।
अगर प्रस्ताव पास हो जाता है तो संबंधित स्पीकर को तुरंत अपने पद से हटना पड़ता है और उसके बाद नया स्पीकर चुना जाता है। हालांकि भारतीय संसदीय इतिहास में बहुत कम ऐसे अवसर आए हैं जब स्पीकर को हटाने के लिए प्रस्ताव लाया गया हो। इसलिए Om Birla के खिलाफ संभावित अविश्वास प्रस्ताव की चर्चा ने राजनीतिक हलकों में नई बहस को जन्म दे दिया है और सभी की नजर इस बात पर है कि सदन में समर्थन का आंकड़ा किसके पक्ष में जाता है।



