
पूर्व CDS जनरल अनिल चौहान ने ऑपरेशन सिंदूर के संदर्भ में युद्ध और राजनीति के संबंध को लेकर अहम बात कही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि राजनीति और युद्ध को एक-दूसरे से अलग करके नहीं देखा जा सकता। उनके मुताबिक किसी भी देश के राजनीतिक हित सबसे महत्वपूर्ण होते हैं और सशस्त्र बल उन हितों की रक्षा करने वाले कई माध्यमों में से एक हैं।
विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन में आयोजित कार्यक्रम में जनरल चौहान ने सैन्य शक्ति को राजनीतिक इच्छाशक्ति का विस्तार बताया। उन्होंने कार्ल वॉन क्लॉजविट्ज के सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा कि युद्ध दूसरे साधनों के जरिए राजनीति का विस्तार है। उनके अनुसार लोकतांत्रिक सरकार जब सैन्य कार्रवाई का फैसला करती है तो सैन्य नेतृत्व की जिम्मेदारी राजनीतिक उद्देश्यों को हासिल करने के लिए अलग-अलग रणनीतिक विकल्प उपलब्ध कराना और उन्हें सफलतापूर्वक लागू करने की क्षमता सुनिश्चित करना है।
ऑपरेशन सिंदूर की रणनीति पर चर्चा करते हुए पूर्व CDS ने सैन्य अभियानों में लगातार बदलाव की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि अगर किसी एक रणनीति को बार-बार दोहराया जाए तो विरोधी को उसके खिलाफ तैयारी करने का मौका मिल जाता है। इसलिए हर अभियान में परिस्थितियों के अनुसार नई रणनीति और विकल्प तैयार करना जरूरी है।
उन्होंने उरी, पुलवामा और ऑपरेशन सिंदूर का उदाहरण देते हुए बताया कि अलग-अलग परिस्थितियों में अलग-अलग सैन्य विकल्पों का इस्तेमाल किया गया। उनके मुताबिक ऑपरेशन सिंदूर में कम ऊंचाई वाले हवाई क्षेत्र के इस्तेमाल की रणनीति का उद्देश्य संघर्ष की सीमा को नियंत्रित रखना और अचानक बढ़त हासिल करना था।
जनरल चौहान ने यह भी बताया कि युद्ध के विकल्प अचानक तैयार नहीं होते। इसके लिए लंबे समय तक प्रशिक्षण, योजना, वॉर-गेमिंग और सैन्य क्षमताओं में निवेश की जरूरत होती है। राजनीतिक नेतृत्व और सैन्य कमांडरों को उपलब्ध विकल्पों के जोखिम तथा राजनीतिक लक्ष्यों के बीच संतुलन बनाकर फैसला लेना होता है।
उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान राजनीतिक नेतृत्व से मिले स्पष्ट निर्देशों का भी जिक्र किया। उनके अनुसार सैन्य नेतृत्व के लिए यह महत्वपूर्ण है कि उसे राजनीतिक उद्देश्य और कार्रवाई की स्पष्ट दिशा मिले, ताकि उपलब्ध सैन्य विकल्पों को प्रभावी तरीके से लागू किया जा सके।
पूर्व CDS ने आधुनिक युद्ध में तकनीक और नई क्षमताओं की बढ़ती भूमिका पर भी जोर दिया। ऑपरेशन सिंदूर से मिले अनुभवों के आधार पर भविष्य की सैन्य तैयारी को लगातार अपडेट करने की जरूरत बताई गई। बदलती युद्ध तकनीक के दौर में सेना को पारंपरिक तरीकों के साथ नए तकनीकी और रणनीतिक विकल्पों के लिए भी तैयार रहना होगा।
कुल मिलाकर जनरल अनिल चौहान का बयान आधुनिक युद्ध में राजनीति, सैन्य शक्ति और रणनीतिक योजना के बीच गहरे संबंध को रेखांकित करता है। ऑपरेशन सिंदूर के अनुभवों से उन्होंने यह संदेश दिया कि भविष्य के सैन्य अभियानों में स्पष्ट राजनीतिक उद्देश्य, पर्याप्त रक्षा क्षमता और बदलती रणनीति महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।



