मैसूर सैंडल सोप की कहानी: 1918 के प्रयोग से करोड़ों का ब्रांड

मैसूर सैंडल सोप की कहानी सिर्फ एक साबुन की नहीं, बल्कि भारत की औद्योगिक और कारोबारी विरासत से जुड़ी कहानी है। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान यूरोप को चंदन का निर्यात प्रभावित होने के बाद मैसूर में उपलब्ध चंदन का इस्तेमाल करने के नए तरीके तलाशे गए। 1916 में Government Sandalwood Oil Factory की स्थापना हुई और चंदन के तेल के उत्पादन पर काम शुरू हुआ।
इसके बाद 1918 में औद्योगिक रसायन विशेषज्ञ एसजी शास्त्री के प्रयासों से चंदन के तेल पर आधारित साबुन तैयार किया गया। इसका विशिष्ट अंडाकार आकार और शरभ प्रतीक इसकी पहचान बने। यही उत्पाद आगे चलकर Mysore Sandal Soap के नाम से लोकप्रिय हुआ।
आज यह ब्रांड Karnataka Soaps and Detergents Limited (KSDL) के अधीन है। ‘Mysore Sandal Soap’ को 2006 में भौगोलिक संकेत यानी GI Tag मिला था, जिसका आधिकारिक रिकॉर्ड भारत के Geographical Indications Registry में दर्ज है।
ब्रांड की मौजूदा कहानी में अभिनेत्री तमन्ना भाटिया भी जुड़ गई हैं। 2026 में KSDL ने उन्हें ब्रांड एंबेसडर बनाया और राष्ट्रीय स्तर पर ब्रांड की पहुंच बढ़ाने की रणनीति पर जोर दिया। कंपनी ने 2030 तक 5,000 करोड़ रुपये के टर्नओवर का लक्ष्य भी बताया है।



