
संयुक्त अरब अमीरात (United Arab Emirates) ने वैश्विक तेल बाजार में अपनी रणनीति बदलते हुए भारत के लिए एक महत्वपूर्ण ऊर्जा साझेदार के रूप में उभरना जारी रखा है। OPEC/OPEC+ व्यवस्था से अलग होने के बाद UAE को उत्पादन बढ़ाने और निर्यात नीति में अधिक लचीलापन मिलने की संभावना जताई जा रही है, जिसका फायदा भारत जैसे बड़े आयातक देशों को मिल सकता है।
विश्लेषकों का मानना है कि UAE की नई रणनीति का उद्देश्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि एशियाई बाजारों—विशेषकर भारत—में अपनी हिस्सेदारी मजबूत करना भी है। कुछ रिपोर्टों के अनुसार, भारत को तेल आपूर्ति के मामले में UAE ने सऊदी अरब की हिस्सेदारी को चुनौती दी है और कई अवधियों में उससे आगे निकलने में सफलता हासिल की है।
हालांकि भारत का सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता अभी भी Russia बना हुआ है। 2025 के आयात आंकड़ों के अनुसार रूस का हिस्सा 38% से अधिक रहा, जबकि Iraq और Saudi Arabia भी प्रमुख आपूर्तिकर्ताओं में शामिल रहे। UAE का हिस्सा लगातार बढ़ता दिखाई दिया, जो भारत की आपूर्ति विविधीकरण रणनीति को भी मजबूत करता है।
ऊर्जा विशेषज्ञों के मुताबिक, यदि UAE उत्पादन क्षमता को और बढ़ाता है तो भारत को अधिक प्रतिस्पर्धी कीमतों पर तेल उपलब्ध हो सकता है। इससे न केवल आयात लागत कम करने में मदद मिलेगी, बल्कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा भी मजबूत होगी। इसके अलावा भारत और UAE के बीच स्थानीय मुद्रा में व्यापार तथा दीर्घकालिक ऊर्जा समझौतों की संभावनाएं भी बढ़ सकती हैं।
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक और उपभोक्ता है। ऐसे में UAE की आक्रामक ऊर्जा रणनीति और भारत के बढ़ते ऊर्जा बाजार का मेल आने वाले वर्षों में दोनों देशों के आर्थिक संबंधों को और मजबूत बना सकता है।



