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यूरिया की कीमतों में गिरावट, DAP महंगा; किसानों पर क्या होगा असर?

भारत में खेती के लिए यूरिया सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाले उर्वरकों में शामिल है। इसकी अंतरराष्ट्रीय कीमतों में हाल के महीनों में काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। सितंबर 2026 में यूरिया का आयात मूल्य घटकर लगभग 392 डॉलर प्रति टन रह गया, जबकि मई 2026 में यह करीब 947 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गया था। इस तरह उच्चतम स्तर से कीमत में लगभग 59% की गिरावट आई है।

इस गिरावट से भारत को यूरिया के आयात पर होने वाला खर्च कम करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत घटने का मतलब यह नहीं है कि किसानों को खुदरा बाजार में यूरिया की बोरी तुरंत और सस्ती मिलेगी। भारत में यूरिया की खुदरा कीमत सरकारी नियंत्रण और सब्सिडी व्यवस्था से प्रभावित होती है।

DAP और फॉस्फोरिक एसिड की कीमतें अब भी चिंता का विषय

यूरिया की कीमतों में गिरावट के बावजूद अन्य प्रमुख उर्वरकों और उनके कच्चे माल की कीमतें ऊंची बनी हुई हैं। डाय-अमोनियम फॉस्फेट (DAP) की आयात कीमत सितंबर में करीब 906 डॉलर प्रति टन रही, जबकि जून में यह लगभग 933 डॉलर प्रति टन थी। यानी इसमें कुछ कमी आई है, लेकिन कीमत अब भी ऊंचे स्तर पर है।

इसके अलावा, फॉस्फोरिक एसिड और सल्फर की महंगी कीमतों से फॉस्फेट आधारित उर्वरकों के उत्पादन की लागत बढ़ रही है। DAP और अन्य जटिल उर्वरकों के निर्माण में इन कच्चे माल की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। आपूर्ति में रुकावट और अंतरराष्ट्रीय तनाव के कारण इनकी लागत पर दबाव बना हुआ है।

किसानों पर क्या होगा असर?

यूरिया की अंतरराष्ट्रीय कीमत कम होने से सरकार को इसे आयात करने में राहत मिल सकती है। लेकिन किसानों को मिलने वाली वास्तविक राहत इस बात पर निर्भर करेगी कि घरेलू आपूर्ति कैसी रहती है, अन्य उर्वरकों की लागत कितनी बढ़ती है और सरकार सब्सिडी व्यवस्था को किस तरह बनाए रखती है।

फिलहाल यूरिया की खुदरा कीमत सरकारी नियंत्रण के तहत है। DAP और अन्य पोषक तत्वों वाले उर्वरकों पर भी सरकारी सहायता का असर पड़ता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय कीमतों में बदलाव का प्रभाव किसानों तक सीधे और तुरंत पहुंचना जरूरी नहीं है। किसानों को खाद खरीदते समय अधिकृत विक्रेताओं से निर्धारित खुदरा कीमत और उपलब्धता की जानकारी लेनी चाहिए।

खाद सब्सिडी पर सरकार का खर्च कितना बढ़ सकता है?

भारत सरकार किसानों को उर्वरक सस्ती दरों पर उपलब्ध कराने के लिए बड़ी राशि सब्सिडी के रूप में खर्च करती है। जब आयात या उत्पादन की लागत बढ़ती है, तो निर्धारित खुदरा कीमत और वास्तविक लागत के बीच के अंतर को पूरा करने के लिए सरकार पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ सकता है।

यूरिया की कीमतों में आई गिरावट से इस बोझ को कम करने में मदद मिल सकती है। लेकिन DAP, म्यूरेट ऑफ पोटाश (MOP), सल्फर और अन्य कच्चे माल की ऊंची कीमतें कुल सब्सिडी खर्च को बढ़ा सकती हैं। अक्टूबर 2026 की रिपोर्टों के अनुसार, वित्त वर्ष 2026-27 में खाद सब्सिडी का खर्च बजट अनुमान से अधिक रहने की आशंका बनी हुई है। वास्तविक खर्च आगे की अंतरराष्ट्रीय कीमतों और उर्वरक की मांग पर निर्भर करेगा।

रबी सीजन में उर्वरक आपूर्ति पर रहेगी नजर

रबी सीजन में गेहूं, सरसों और चना जैसी फसलों के लिए उर्वरकों की मांग महत्वपूर्ण रहती है। ऐसे में सरकार और उर्वरक कंपनियों के सामने पर्याप्त स्टॉक बनाए रखने तथा आयात को समय पर पूरा करने की चुनौती होगी।

यूरिया की सस्ती अंतरराष्ट्रीय कीमतें आयात लागत को कम करने में सहायक हो सकती हैं, लेकिन DAP और फॉस्फेट आधारित उर्वरकों की उपलब्धता पर भी नजर रखना जरूरी है। किसानों के लिए सही समय पर खाद उपलब्ध होना उतना ही महत्वपूर्ण है जितना उसकी कीमत।

निष्कर्ष

अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया की कीमतों में गिरावट भारत के लिए राहत का संकेत है, लेकिन DAP, फॉस्फोरिक एसिड और सल्फर की ऊंची कीमतें उर्वरक क्षेत्र की चुनौतियों को पूरी तरह खत्म नहीं करतीं। किसानों को फिलहाल खुदरा कीमतों में तत्काल बदलाव मानकर नहीं चलना चाहिए। रबी सीजन के दौरान उर्वरकों की उपलब्धता, सरकारी सब्सिडी और आधिकारिक मूल्य संबंधी घोषणाएं इस बात को तय करने में अहम होंगी कि इस बदलाव का किसानों को कितना फायदा मिलता है।

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