Wheat Export: दुनिया को चाहिए नया सप्लायर, भारत के पास ₹1.41 लाख करोड़ का मौका

दुनिया के गेहूं बाजार में बदलते हालात भारत के लिए बड़ा कारोबारी अवसर लेकर आए हैं। ASSOCHAM की रिपोर्ट के मुताबिक भारत आने वाले समय में 1.5 अरब डॉलर से अधिक का गेहूं निर्यात कर सकता है। मौजूदा विनिमय दर के हिसाब से यह रकम करीब ₹1.41 लाख करोड़ बैठती है। रिकॉर्ड उत्पादन, पर्याप्त सरकारी स्टॉक और वैश्विक खरीदारों की सप्लाई स्रोतों में विविधता लाने की कोशिश भारत के पक्ष में जा रही है।
भारत ने वित्त वर्ष 2025-26 में करीब 120.7 मिलियन टन गेहूं का रिकॉर्ड उत्पादन किया है। इसके साथ ही 28 मई 2026 तक केंद्रीय पूल में गेहूं का स्टॉक करीब 51.3 मिलियन टन था, जो 1 जुलाई के निर्धारित बफर मानक 27.58 मिलियन टन से काफी अधिक है। इससे घरेलू खाद्य सुरक्षा बनाए रखते हुए अतिरिक्त मात्रा को निर्यात के लिए इस्तेमाल करने की गुंजाइश बनती है।
भारत के लिए एक और सकारात्मक पहलू निर्यात नीति में बदलाव है। 2026 में सरकार ने गेहूं और कुछ संबंधित उत्पादों के निर्यात पर लगी पाबंदियों में धीरे-धीरे ढील दी है। इससे भारतीय निर्यातकों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में दोबारा अपनी मौजूदगी मजबूत करने का अवसर मिला है।
दुनिया क्यों तलाश रही नया गेहूं सप्लायर?
वैश्विक गेहूं बाजार इस समय कई तरह की अनिश्चितताओं से गुजर रहा है। ब्लैक सी क्षेत्र में युद्ध और बुनियादी ढांचे पर हमलों से रूस और यूक्रेन से होने वाली आपूर्ति प्रभावित हुई है। इसका असर एशियाई खरीदारों पर भी पड़ा है और कई देशों ने ऑस्ट्रेलिया तथा अर्जेंटीना से गेहूं की खरीद बढ़ाई है।
ऐसे माहौल में आयात करने वाले देश अपने गेहूं स्रोतों को एक-दो देशों तक सीमित रखने के बजाय अलग-अलग सप्लायरों की तलाश कर रहे हैं। भारत के लिए यही बदलाव एक बड़ा अवसर बन सकता है। अगर भारतीय कंपनियां लगातार गुणवत्ता और समय पर आपूर्ति सुनिश्चित करती हैं, तो नए बाजारों में लंबी अवधि के कारोबारी संबंध बनाए जा सकते हैं।
कीमत के मोर्चे पर भी भारत मजबूत
ASSOCHAM के अनुसार भारतीय गेहूं को अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत के स्तर पर भी फायदा मिल सकता है। वित्त वर्ष 2026-27 के लिए गेहूं का MSP करीब 268 डॉलर प्रति टन के बराबर था, जबकि मई 2026 में अंतरराष्ट्रीय गेहूं कीमत लगभग 303 डॉलर प्रति टन थी। यानी करीब 35 डॉलर प्रति टन का अंतर भारतीय गेहूं को प्रतिस्पर्धी बनाने में मदद कर सकता है।
हालांकि केवल सस्ती कीमत के आधार पर भारत स्थायी रूप से वैश्विक बाजार में बड़ी हिस्सेदारी हासिल नहीं कर सकता। निर्यातकों को गुणवत्ता, ग्रेडिंग, पैकेजिंग और समय पर डिलीवरी जैसे मानकों पर भी लगातार ध्यान देना होगा।
बांग्लादेश सबसे बड़ा संभावित बाजार
ASSOCHAM ने बांग्लादेश को भारतीय गेहूं के लिए सबसे मजबूत संभावित बाजारों में बताया है। बांग्लादेश ने 2024-25 में करीब 6.7 मिलियन टन गेहूं का आयात किया था और भारत पहले से ही उसके प्रमुख आपूर्तिकर्ताओं में शामिल है। भौगोलिक निकटता और अपेक्षाकृत कम परिवहन लागत भारत को इस बाजार में अतिरिक्त फायदा दे सकती है।
इसके अलावा मिस्र, इंडोनेशिया, अल्जीरिया, मोरक्को और फिलीपींस जैसे देशों में भी भारतीय गेहूं के लिए विस्तार की संभावनाएं बताई गई हैं। इन बाजारों में धीरे-धीरे निर्यात बढ़ाकर भारत अपने ग्राहक आधार को व्यापक बना सकता है।
उत्पादन घटने का भी मिल सकता है फायदा
वैश्विक स्तर पर 2026-27 में गेहूं उत्पादन करीब 819 मिलियन टन रहने का अनुमान है, जो 2025-26 के रिकॉर्ड 843.8 मिलियन टन से कम है। प्रमुख उत्पादक देशों में मौसम संबंधी चुनौतियों के कारण उत्पादन और आपूर्ति पर दबाव बन सकता है। ऐसे में भारत जैसे बड़े उत्पादक देश के लिए अतिरिक्त निर्यात अवसर पैदा हो सकते हैं।
भारत के लिए चुनौती यह होगी कि वह निर्यात बढ़ाने के साथ घरेलू बाजार में कीमतों और खाद्य सुरक्षा का संतुलन भी बनाए रखे। गेहूं जैसी आवश्यक खाद्य वस्तु के मामले में निर्यात नीति में अचानक बदलाव से अंतरराष्ट्रीय खरीदारों का भरोसा प्रभावित हो सकता है। इसलिए उद्योग संगठन ने स्थिर और पूर्वानुमान योग्य निर्यात नीति की जरूरत पर जोर दिया है।
लॉजिस्टिक्स और स्टोरेज में निवेश जरूरी
भारत को इस अवसर का पूरा फायदा उठाने के लिए बंदरगाहों, वेयरहाउस, परीक्षण सुविधाओं और परिवहन नेटवर्क को मजबूत करना होगा। बेहतर स्टोरेज से अनाज की गुणवत्ता बनाए रखने में मदद मिलेगी, जबकि कुशल लॉजिस्टिक्स से अंतरराष्ट्रीय बाजार में डिलीवरी अधिक प्रतिस्पर्धी हो सकेगी। ASSOCHAM ने भी दीर्घकालिक सफलता के लिए इन क्षेत्रों में निवेश को महत्वपूर्ण बताया है।
कुल मिलाकर, वैश्विक गेहूं बाजार में सप्लाई स्रोतों के विविधीकरण की कोशिश भारत के लिए बड़ा मौका लेकर आई है। रिकॉर्ड 120.7 मिलियन टन उत्पादन, पर्याप्त स्टॉक और प्रतिस्पर्धी कीमत भारत को मजबूत स्थिति में रखते हैं। यदि देश गुणवत्ता, लॉजिस्टिक्स और स्थिर निर्यात नीति पर ध्यान देता है, तो भारत आने वाले वर्षों में वैश्विक गेहूं व्यापार में एक भरोसेमंद और महत्वपूर्ण सप्लायर के रूप में अपनी स्थिति मजबूत कर सकता है।



