होर्मुज संकट से बढ़ी कोयले की मांग, भारत पर असर

होर्मुज जलडमरूमध्य में जारी संकट ने वैश्विक ऊर्जा बाजार की तस्वीर बदल दी है। इस मार्ग से सीधे तौर पर बहुत कम कोयला गुजरता है, लेकिन यहां पैदा हुए व्यवधान का अप्रत्यक्ष असर कोयले के बाजार पर पड़ रहा है। LNG की आपूर्ति प्रभावित होने और प्राकृतिक गैस महंगी होने से कई देशों के लिए कोयला बिजली उत्पादन का वैकल्पिक ईंधन बन रहा है।
IEA के मुताबिक 2026 में वैश्विक कोयले की मांग 1.2% बढ़कर 8.94 अरब टन के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच सकती है। यह अनुमान पहले लगाए गए गिरावट के अनुमान से अलग है। मध्य पूर्व संकट के साथ-साथ मौसम और बिजली की बढ़ती जरूरत भी कोयले की मांग को बढ़ाने वाले प्रमुख कारणों में शामिल हैं।
भारत में भी ऊर्जा की बढ़ती जरूरत इस बदलाव को महत्वपूर्ण बनाती है। देश में सितंबर के दौरान बिजली की मांग 260 गीगावाट से ऊपर पहुंच चुकी है, जबकि कई ताप विद्युत संयंत्रों के पास कोयले का स्टॉक दबाव में है। ऐसे में घरेलू मांग बढ़ने पर कोयले की उपलब्धता और कीमत दोनों महत्वपूर्ण मुद्दे बन सकते हैं।
भारत पर इसका असर केवल कोयले की कीमत तक सीमित नहीं रहेगा। यदि वैश्विक स्तर पर गैस और कोयले की कीमतों में लंबे समय तक उतार-चढ़ाव रहता है, तो बिजली उत्पादन की लागत, आयात बिल और ऊर्जा क्षेत्र की कंपनियों पर भी दबाव पड़ सकता है। भारत पहले ही होर्मुज संकट के कारण बढ़ी जीवाश्म ईंधन लागत का सामना कर चुका है।
हालांकि, इस संकट का एक दूसरा पहलू भी है। महंगे गैस ईंधन के कारण कोयले की मांग बढ़ना यह दिखाता है कि वैश्विक ऊर्जा व्यवस्था अभी भी पारंपरिक ईंधनों पर काफी निर्भर है। भारत के लिए यह स्थिति घरेलू कोयला उत्पादन, ऊर्जा भंडारण, नवीकरणीय ऊर्जा और आपूर्ति स्रोतों में विविधता बढ़ाने की जरूरत को भी रेखांकित करती है।



