
सुप्रीम कोर्ट के एक जज ने हाल ही में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि भले ही AI तकनीक तेजी से विकसित हो रही हो और कई क्षेत्रों में मददगार साबित हो रही हो, लेकिन यह वकीलों के प्रशिक्षित दिमाग और जजों की नैतिक जिम्मेदारी का स्थान नहीं ले सकती। उनका कहना था कि न्यायिक प्रक्रिया केवल कानून की जानकारी तक सीमित नहीं होती, बल्कि इसमें मानवीय समझ, अनुभव और नैतिक दृष्टिकोण भी जरूरी होता है।
जज ने यह भी कहा कि AI का उपयोग न्यायपालिका में सहायक उपकरण के रूप में किया जा सकता है, जैसे कि दस्तावेजों की खोज, कानूनी शोध या डेटा विश्लेषण में। इससे न्यायिक कार्यों को तेज और अधिक व्यवस्थित बनाने में मदद मिल सकती है, लेकिन अंतिम निर्णय लेने की जिम्मेदारी हमेशा इंसानों की ही रहनी चाहिए।
उन्होंने यह भी जोर दिया कि न्याय प्रणाली का मूल आधार निष्पक्षता, संवेदनशीलता और नैतिक जिम्मेदारी है, जिसे किसी मशीन या एल्गोरिद्म से पूरी तरह प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता। इसलिए AI को केवल सहयोगी तकनीक के रूप में इस्तेमाल करना ही बेहतर और सुरक्षित माना जाएगा।



