
देश में आयोजित एक प्रतिष्ठित AI शिखर सम्मेलन के दौरान उस समय हंगामे की स्थिति बन गई, जब भारतीय युवा कांग्रेस से जुड़े कार्यकर्ताओं ने कार्यक्रम स्थल के बाहर विरोध-प्रदर्शन किया। यह सम्मेलन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिजिटल गवर्नेंस और उभरती तकनीकों पर केंद्रित था, जिसमें देश-विदेश के विशेषज्ञ, नीति-निर्माता और उद्योग जगत के प्रतिनिधि शामिल हुए थे। विरोध-प्रदर्शन के चलते कुछ समय के लिए कार्यक्रम की कार्यवाही प्रभावित हुई और सुरक्षा व्यवस्था कड़ी करनी पड़ी। इस घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए कई पूर्व न्यायाधीशों और वरिष्ठ राजनयिकों ने इसे लोकतांत्रिक परंपराओं के विपरीत बताया। उनका कहना था कि किसी भी वैचारिक असहमति को शांतिपूर्ण और गरिमापूर्ण तरीके से रखा जाना चाहिए, न कि ऐसे मंचों को बाधित कर जो राष्ट्रीय हित से जुड़े हों। पूर्व न्यायाधीशों ने कहा कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है, लेकिन उसके साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है। वहीं, कुछ पूर्व राजनयिकों ने चिंता जताई कि अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों की मौजूदगी में इस तरह का विरोध देश की छवि को प्रभावित कर सकता है। उन्होंने कहा कि AI जैसे संवेदनशील और भविष्य-निर्धारक विषय पर गंभीर संवाद की आवश्यकता है, न कि राजनीतिक टकराव की। दूसरी ओर, युवा कांग्रेस के नेताओं का तर्क था कि वे अपनी मांगों और चिंताओं को उजागर करने के लिए लोकतांत्रिक अधिकार का उपयोग कर रहे थे। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीकी प्रगति और राजनीतिक मतभेदों को अलग-अलग मंचों पर सुलझाना अधिक उचित होगा। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह बहस तेज कर दी है कि लोकतांत्रिक विरोध की सीमाएं क्या होनी चाहिए और राष्ट्रीय महत्व के आयोजनों में राजनीतिक हस्तक्षेप किस हद तक स्वीकार्य है।



