
अमेरिका की राजनीति में एक बार फिर टैरिफ और प्रतिबंधों को लेकर सख्त बयानबाजी तेज हो गई है। पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के करीबी और उनके प्रशासन से जुड़े एक वरिष्ठ मंत्री के बयान ने अंतरराष्ट्रीय बाजारों में हलचल मचा दी है। बयान में संकेत दिया गया है कि रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर अमेरिका बेहद कठोर कदम उठा सकता है और जरूरत पड़ी तो 500 प्रतिशत तक टैरिफ लगाया जा सकता है। इस बयान के बाद भारत समेत उन सभी देशों की चिंता बढ़ गई है, जो रूस से कच्चा तेल आयात कर रहे हैं। भारत ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए रूस से सस्ते दामों पर तेल खरीदा है, जिससे घरेलू महंगाई पर नियंत्रण रखने में मदद मिली है।
ट्रंप समर्थक खेमे का मानना है कि रूस से तेल खरीदकर कई देश अप्रत्यक्ष रूप से उसे आर्थिक सहारा दे रहे हैं, जो अमेरिका की विदेश नीति के खिलाफ है। इसी तर्क के आधार पर 500% टैरिफ जैसी कड़ी सजा की बात कही जा रही है। हालांकि यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि यह बयान चुनावी रणनीति का हिस्सा है या वास्तव में किसी ठोस नीति की ओर इशारा करता है। विशेषज्ञों का कहना है कि इतना बड़ा टैरिफ वैश्विक व्यापार नियमों और विश्व व्यापार संगठन (WTO) के सिद्धांतों से टकरा सकता है।
भारत की बात करें तो उसने हमेशा यह रुख अपनाया है कि ऊर्जा खरीद एक संप्रभु और आर्थिक फैसला है, न कि राजनीतिक। भारत का तर्क है कि वह अंतरराष्ट्रीय कानूनों का पालन करते हुए अपने नागरिकों के हितों को प्राथमिकता देता है। अगर अमेरिका वाकई इतना भारी टैरिफ लगाता है, तो इससे भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों में तनाव आ सकता है और दोनों देशों के बीच चल रहे रणनीतिक सहयोग पर भी असर पड़ सकता है।
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि 500% टैरिफ जैसी नीति से अमेरिकी उपभोक्ताओं को भी नुकसान होगा, क्योंकि आयातित वस्तुएं महंगी हो जाएंगी और वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित होगी। इसके अलावा, इससे डॉलर आधारित व्यापार व्यवस्था पर भी दबाव बढ़ सकता है। फिलहाल यह बयान एक चेतावनी की तरह देखा जा रहा है, लेकिन आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि क्या अमेरिका वास्तव में इस तरह के कठोर कदम उठाता है या यह सिर्फ राजनीतिक दबाव बनाने की रणनीति है।
