
ग्रीनलैंड को लेकर एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल तेज हो गई है। हाल ही में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने अमेरिका की मंशा को लेकर बड़ा बयान देते हुए कहा कि वॉशिंगटन की नजर सिर्फ रणनीतिक फायदे और प्राकृतिक संसाधनों पर है। पुतिन के इस बयान के बाद यह सवाल उठने लगा है कि क्या भविष्य में डेनमार्क ग्रीनलैंड को बेचने जैसे किसी फैसले पर विचार कर सकता है। गौरतलब है कि ग्रीनलैंड डेनमार्क का स्वायत्त क्षेत्र है और भौगोलिक दृष्टि से यह अमेरिका, रूस और यूरोप के लिए बेहद अहम माना जाता है। पहले भी अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ग्रीनलैंड को खरीदने की इच्छा जता चुके हैं, जिसे उस समय डेनमार्क ने सिरे से खारिज कर दिया था।
पुतिन के अनुसार, अमेरिका का असली मकसद सुरक्षा या सहयोग नहीं, बल्कि आर्कटिक क्षेत्र में अपना दबदबा बढ़ाना और वहां मौजूद दुर्लभ खनिज संसाधनों पर नियंत्रण हासिल करना है। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन के कारण आर्कटिक क्षेत्र तेजी से रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होता जा रहा है, जिससे बड़ी ताकतों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ गई है। ग्रीनलैंड में मौजूद खनिज, तेल और गैस के भंडार अमेरिका के लिए आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं।
हालांकि, डेनमार्क सरकार और ग्रीनलैंड के स्थानीय नेतृत्व ने साफ कर दिया है कि ग्रीनलैंड बिक्री की कोई संभावना नहीं है। ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री भी कई बार कह चुके हैं कि उनका क्षेत्र “बिकाऊ” नहीं है और भविष्य का फैसला वहां के लोगों की इच्छा से होगा। इसके बावजूद, अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ मानते हैं कि अमेरिका अपने कूटनीतिक, आर्थिक और सैन्य प्रभाव के जरिए ग्रीनलैंड में अपनी मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश करता रहेगा।
पुतिन का यह बयान केवल ग्रीनलैंड तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अमेरिका की वैश्विक नीति पर भी सवाल खड़े करता है। रूस का मानना है कि अमेरिका दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में अपने हितों के लिए दबाव की राजनीति करता है। ऐसे में ग्रीनलैंड का मुद्दा आने वाले समय में डेनमार्क, अमेरिका और रूस के बीच कूटनीतिक तनाव को और बढ़ा सकता है। कुल मिलाकर, ग्रीनलैंड की बिक्री भले ही अभी असंभव लगे, लेकिन इस पर चल रही वैश्विक राजनीति यह जरूर दिखाती है कि आर्कटिक क्षेत्र आने वाले वर्षों में महाशक्तियों के टकराव का नया केंद्र बन सकता है।



