
भारत ने एक बार फिर अपनी अद्वितीय रक्षा क्षमता और तकनीकी शक्ति का लोहा पूरी दुनिया को मनवाया है। हाल ही में चीन ने भी यह स्वीकार किया है कि भारत ने लेजर मारक क्षमता के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हासिल की है और अब दुनिया के उन चुनिंदा 7 देशों में शामिल हो चुका है, जिनके पास यह अत्याधुनिक तकनीक मौजूद है। लेजर हथियार प्रणाली को भविष्य का युद्धास्त्र माना जा रहा है क्योंकि यह पारंपरिक हथियारों की तुलना में कई गुना तेज, सटीक और किफायती है।
लेजर हथियारों की खासियत यह है कि इनमें प्रकाश किरणों का उपयोग करके लक्ष्य को सेकंडों में नष्ट करने की क्षमता होती है। इससे न केवल युद्धक्षेत्र में दुश्मन की मिसाइलों, ड्रोन और विमानों को रोका जा सकता है बल्कि यह भविष्य में साइबर और स्पेस वारफेयर में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। भारत ने लंबे समय तक अनुसंधान और रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) की मेहनत से इस तकनीक को विकसित किया है।
चीन का भारत की इस क्षमता को स्वीकार करना अपने आप में एक बड़ी कूटनीतिक और सामरिक जीत है। चीन खुद भी इस तकनीक पर काम कर रहा है, लेकिन भारत का इस क्षेत्र में प्रवेश करना एशिया में शक्ति संतुलन को नया आयाम दे रहा है। यह भारत की रक्षा रणनीति और स्वदेशी तकनीक पर निर्भरता को भी दर्शाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत लगातार “मेक इन इंडिया” और “आत्मनिर्भर भारत” अभियान को आगे बढ़ा रहा है और रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हासिल करने की दिशा में बड़े कदम उठा चुका है।
दुनिया में केवल अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस, इज़रायल और जर्मनी जैसे देश ही अब तक इस तकनीक में महारत रखते थे। भारत का इस सूची में शामिल होना न सिर्फ गर्व का विषय है बल्कि यह भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका का भी प्रतीक है। यह उपलब्धि आने वाले वर्षों में भारतीय सेना की मारक क्षमता को और भी बढ़ा देगी और सीमा सुरक्षा को मजबूत बनाएगी।
लेजर हथियारों से न केवल युद्धक क्षमता बढ़ेगी बल्कि रक्षा खर्च में भी उल्लेखनीय कमी आएगी। इसके अलावा यह तकनीक भविष्य के “हाई-टेक वॉर” के लिए भी बेहद उपयोगी साबित होगी। चीन द्वारा भारत की इस क्षमता को मान्यता देना इस बात का प्रमाण है कि भारत अब किसी भी लिहाज से वैश्विक सैन्य ताकतों की दौड़ में पीछे नहीं है, बल्कि तेजी से आगे बढ़ रहा है।



