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फील्ड मार्शल आसिम मुनीर: क्या शहबाज ने की बड़ी गलती?

पाकिस्तान की राजनीति एक बार फिर उथल-पुथल के दौर में है। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ द्वारा सेनाध्यक्ष जनरल आसिम मुनीर को फील्ड मार्शल की उपाधि देने के फैसले ने देश की सियासत में हलचल मचा दी है। यह कदम सेना को और अधिक ताकतवर बना सकता है, जो लोकतांत्रिक ढांचे के लिए खतरे की घंटी मानी जा रही है।

आलोचकों का मानना है कि इस फैसले से सेना को अप्रत्याशित राजनीतिक प्रभाव मिलेगा और सत्ता संतुलन बिगड़ सकता है। कुछ रिपोर्ट्स में यह भी कहा जा रहा है कि इससे राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी की कुर्सी खतरे में पड़ सकती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला एक संभावित सैन्य हस्तक्षेप या तख्तापलट की भूमिका तैयार कर सकता है।

पाकिस्तान जैसे देश, जहां पहले ही सेना का दखल लोकतंत्र में कई बार देखा गया है, वहां एक फील्ड मार्शल की नियुक्ति का मतलब है – सेना का और भी ऊंचा दर्जा। इससे प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की मंशा और दबाव की स्थिति पर भी सवाल उठ रहे हैं।

आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह कदम देश को स्थिरता की ओर ले जाएगा या एक और राजनीतिक संकट की शुरुआत करेगा।

पाकिस्तान के इतिहास को देखें तो सेना ने बार-बार लोकतांत्रिक सरकारों को कमजोर किया है या सत्ता से हटाया है। अयूब खान, याह्या खान, जनरल जिया-उल-हक और परवेज मुशर्रफ जैसे नाम इसकी गवाही देते हैं। ऐसे में आसिम मुनीर को फील्ड मार्शल बनाना न केवल सेना के प्रभाव को औपचारिक रूप से बढ़ाता है, बल्कि यह संकेत भी देता है कि असली सत्ता कहां है। इससे लोकतांत्रिक संस्थाएं और ज्यादा असहाय महसूस कर सकती हैं।

राष्ट्रपति जरदारी की स्थिति भी इस पूरे घटनाक्रम में कमजोर नजर आ रही है। एक ओर सरकार पर सेना का दबाव है, वहीं दूसरी ओर राष्ट्रपति की भूमिका महज़ औपचारिक बनकर रह गई है। यदि तख्तापलट की आहट सच साबित होती है, तो सबसे पहले असर राष्ट्रपति पद पर ही पड़ सकता है, जिसे हटाकर कोई ‘अनुकूल’ चेहरा बिठाया जा सकता है।

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