
करीब दो दशक तक चली लंबी बातचीत और कई दौर की असफल वार्ताओं के बाद आखिरकार भारत और यूरोपीय संघ (ईयू) के बीच मेगा ट्रेड डील पर सहमति बनती दिख रही है, जिसे रिकॉर्ड समय में अंतिम रूप देकर इसी साल हस्ताक्षर किए जाने की तैयारी है। इस ऐतिहासिक समझौते को भारत-ईयू फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) के रूप में देखा जा रहा है, जो दोनों पक्षों के आर्थिक रिश्तों को नई ऊंचाई देगा। वर्ष 2007 में शुरू हुई इस वार्ता में टैरिफ, बाजार पहुंच, डेटा सुरक्षा, बौद्धिक संपदा अधिकार, श्रम और पर्यावरण मानकों जैसे जटिल मुद्दों के कारण बार-बार अड़चनें आईं, लेकिन मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों, सप्लाई चेन में बदलाव और भू-राजनीतिक संतुलन ने दोनों को तेजी से समझौते की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित किया। इस डील के तहत भारतीय उत्पादों को यूरोपीय बाजारों में बेहतर पहुंच मिलने की उम्मीद है, जिससे टेक्सटाइल, फार्मा, ऑटो कंपोनेंट्स, आईटी सेवाएं और कृषि आधारित उद्योगों को बड़ा लाभ होगा, वहीं ईयू को भारत जैसे तेजी से बढ़ते बाजार में निवेश और व्यापार के नए अवसर मिलेंगे। सरकार का मानना है कि इस समझौते से निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि होगी, लाखों नए रोजगार सृजित होंगे और ‘मेक इन इंडिया’ तथा ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसे अभियानों को मजबूती मिलेगी। इसके साथ ही ईयू की उन्नत तकनीक, हरित ऊर्जा समाधान और टिकाऊ विकास से जुड़े निवेश भारत में आएंगे, जिससे जलवायु लक्ष्यों को हासिल करने में भी मदद मिलेगी। जानकारों के अनुसार यह समझौता सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि रणनीतिक साझेदारी, डिजिटल सहयोग और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में भारत की भूमिका को भी मजबूत करेगा। प्रधानमंत्री स्तर पर लगातार संवाद, कूटनीतिक सक्रियता और आपसी लचीलेपन के चलते यह डील अब अंतिम चरण में पहुंच चुकी है। यदि सब कुछ योजना के अनुसार रहा तो यह समझौता भारत के आर्थिक इतिहास में एक मील का पत्थर साबित होगा, जो न केवल दो महाद्वीपों को करीब लाएगा बल्कि वैश्विक व्यापार में भारत की साख और प्रभाव को भी नई पहचान देगा।



