गोरखपुर में बोले सीएम योगी- कर्ता के प्रति कृतज्ञता का भाव सनातन का पहला संस्कार

गोरखपुर में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म की गहराइयों को उजागर किया। उन्होंने कहा कि “कर्ता के प्रति कृतज्ञता का भाव ही सनातन का पहला संस्कार है”। योगी जी ने समझाया कि हमारी परंपरा में हमेशा से यह माना गया है कि जिसने भी हमें कुछ दिया है, चाहे वह ज्ञान हो, भोजन हो या कोई अवसर, उसके प्रति आभार प्रकट करना ही मानव का पहला कर्तव्य है। यही भाव हमें समाज को जोड़ने और संस्कारों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाने की प्रेरणा देता है।
सीएम योगी ने कहा कि भारतीय संस्कृति में ‘कृतज्ञता’ केवल शब्द भर नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की शैली है। जब हम अपने माता-पिता, गुरु, प्रकृति, राष्ट्र और समाज के प्रति आभार व्यक्त करते हैं, तभी वास्तविक रूप से सनातन धर्म का पालन करते हैं। उन्होंने बताया कि सनातन धर्म किसी संकीर्णता का नाम नहीं, बल्कि यह विश्व को जोड़ने वाला, सबको समान मानने वाला और सबके कल्याण की भावना से प्रेरित मार्ग है।
कार्यक्रम में सीएम योगी ने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे कोई किसान अन्न उगाता है, शिक्षक ज्ञान देता है और सैनिक देश की रक्षा करता है, वैसे ही हर व्यक्ति अपने-अपने स्तर पर समाज के लिए योगदान करता है। ऐसे में हमें उनके प्रति हमेशा आभारी रहना चाहिए। यही भाव हमारे समाज को मजबूत और संस्कारित बनाता है।
उन्होंने यह भी कहा कि जब कोई व्यक्ति कृतज्ञता का भाव भूल जाता है, तो वह अहंकार और स्वार्थ की ओर बढ़ता है। यही कारण है कि सनातन परंपरा में पहले दिन से ही बच्चों को यह शिक्षा दी जाती रही है कि भोजन से पहले अन्नदाता और ईश्वर का स्मरण करो, गुरुजन के चरण छुओ और प्रकृति के प्रति सम्मान का भाव रखो। यही संस्कार हमारे जीवन को संतुलित और श्रेष्ठ बनाते हैं।
सीएम योगी ने युवाओं को संदेश देते हुए कहा कि आधुनिकता और तकनीक का स्वागत करें, लेकिन अपनी जड़ों और संस्कृति को कभी न भूलें। उन्होंने कहा कि यदि हम अपने जीवन में कृतज्ञता और विनम्रता का भाव रखते हैं, तो सफलता अपने आप हमारे पास आएगी। यही संस्कार व्यक्ति को महान बनाते हैं और राष्ट्र को भी प्रगति की राह पर आगे बढ़ाते हैं।
गोरखपुर में दिया गया यह संदेश न केवल क्षेत्र के लिए, बल्कि पूरे देश के लिए प्रेरणादायी है। योगी आदित्यनाथ ने अपने उद्बोधन से यह स्पष्ट कर दिया कि सनातन धर्म का सार किसी पूजा-पद्धति तक सीमित नहीं, बल्कि यह जीवन मूल्यों और आचरण का ऐसा मार्ग है, जो विश्व मानवता को जोड़ता है। कर्ता के प्रति कृतज्ञता का भाव अपनाकर ही हम सनातन संस्कृति को सच्चे अर्थों में जीवित रख सकते हैं।



